दान कुपात्र को न मिले



--के• विक्रम राव,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

सोमवार 21 सितम्बर, 2020 को लोकसभा ने विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA), 2020, पारित कर दिया।

यह कदाचार पर खरोंच मात्र है।

इस कानून के तहत स्वयंसेवी संस्थाओं (NGO) पर वित्तीय अनुशासन कड़ा होगा। नरेंद्र मोदी ने इसे ‘पंच सितारा उद्यम’ बताया जिससे उनकी एनडीए सरकार को पलटने का प्रयास अनवरत होता रहा।

हालाँकि मनमोहन सिंह के संप्रग (2004 से 2014) के दशक में यह कांग्रेसियों की बड़ी प्रियदर्शी तथा मनोरम योजना रही। अब भाजपा इतनी कृपण है कि कमाई के एवज में लाभांश भी नहीं बांटेगी।

प्रधानमंत्री की गिला थी कि “कुछ एनजीओ से उन्होंने हिसाब माँगा तो विरोध में सब इकट्ठे हो गए।”

इसीलिए एनडीए सरकार को सर्वोच्च न्यायलय का निर्देश (11 जनवरी 2017) बड़ा मनभावन लगा कि भारत के तीस लाख एनजीओं का आडिट कराया जाए। जो जालसाजी और ठगी करते हैं, उनका पंजीयन निरस्त हो।

सीबीआई की जांच के अनुसार केवल दस प्रतिशत (तीन लाख) NGO ही सोसाइटी (रजिस्ट्रेशन) को वार्षिक हिसाब जमा करते हैं। हालाँकि दुनियाभर से उन्हें अरबों डालर की राशि मिलती है।

सीबीआई के अधिवक्ता पीके डे ने सर्वोच्च न्यायलय को (15 सितम्बर 2016) दंग कर दिया था यह बताकर कि असम में सत्तानवे हजार एनजीओ ने तो सालाना कानूनी हिसाब सरकारी पंजीयन रजिस्ट्रार को दिया ही नहीं।

दिलचस्प बिंदु यह है कि आईबी की जाँच ने पाया था कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने स्वयं सारी शासकीय योजनाओं को विभिन्न एनजीओं को दे दिया था। इनमें कतिपय एनजीओ दानदाता देशों के लिए संवेदनशील सूचना भी बटोरते हैं।

एक अंग्रेजी अखबार ने डच सरकार द्वारा पोषित कोर्डएड नामक एनजीओ के बारे में खुलासा किया था कि वह उत्तर-पूर्व के राज्य में जीपीएस ट्रैकिंग के जरिये तेल के कुओं, खदान, जंगल, बाँध आदि के बारे में न केवल जानकारी जुटाने में जुटी हैं, बल्कि वहाँ चर्च की सहायता से इसके लिए स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षित कर रही हैं ताकि यहाँ के लोग सीधे अमरीका व यूरोप के लिए जासूस की भूमिका में शामिल हों।

संसद द्वारा पारित विधेयक में इस बार एक-एक प्रावधान खास हैं। विदेशी सहायता की राशि में से रखरखाव और सजावट पर व्यय हो रहे पचास प्रतिशत को काटकर अब बीस फीसद कर दिया गया है।

इस पर कई एनजीओ ने आलोचना की है कि “यह सामान्यजन के सहायता का मृत्युघंट है।”

जवाब में संसद को बताया गया कि यह पचास प्रतिशत दान की राशि कार्यालय के रख रखाव पर ही नहीं वरन संचालकों के निजी आवास आदि पर भी खर्च की जाती रही है। यह बात तो जांच योग्य है। एनजीओ के निदेशकों की जीवन शैली से यह तथ्य उभर आयेगा।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र को एडीजी तुषार मेहता ने बताया था कि सबरंग ट्रस्ट की मालकिन तीस्ता सीतलवाड़ ने एनजीओ की सहायता में प्राप्त राशि के हिस्से को मदिरा खरीदने पर व्यय कर डाला था।

अब कुछ आंकड़े, कि किस प्रदेश को बड़ी विदेशी धनराशि मिली है। ये दस राज्य हैं : दिल्ली, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात, उत्तर प्रदेश तथा ओड़िसा।

वे शीर्ष दस राष्ट्र जिन्होंने भारत को बड़ी उदारता से दान दिया : अमेरिका (37.97 अरब रूपये), जर्मनी (10.89 अरब), ब्रिटेन (10.64 अरब), इटली (4.98 अरब), नीदरलैंड (3.81 अरब), स्विट्ज़रलैंड (3. 64 अरब), स्पेन (3.38 अरब), कनाडा (3. 01 अरब), ऑस्ट्रेलिया (2.24 अरब) तथा फ़्रांस (1.77 अरब)।

पुछल्ला : बापू के नाम पर एनजीओ की तिजारत : सेवाग्राम (वर्धा, जिसकी जनसँख्या लखनऊ के आधे से कम है, वहाँ सौ से ऊपर एनजीओं ने अपना पंजीकृत पता दिया है।

कारण ?

समूचा विश्व महात्मा गाँधी के नाम पर उदारता से सहायता करता है। यह चतुर बौद्धिकों द्वारा भावनात्मक शोषण है।

बापू को शांति मिलेगी ?

मेरी स्कूली शिक्षा सेवाग्राम में हुई है। मैंने राष्ट्रपिता के चरणों का स्पर्श किया है। अब संसदीय जाँच से मुझे तस्कीन मिलेगी।

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