सामूहिक चेतना के साथ करें दीप प्रज्जवलन, वंचितों, उपेक्षितों की दिवाली भी करें रोशन : प्रो• विनय कुमार पाण्डेय



--प्रो• विनय कुमार पाण्डेय,
अध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-उत्तर प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

भारत एक ऐसा देश है जिसकी सांस्कृतिक चेतना सहित पूर्ण अर्थव्यवस्था यहां की धार्मिक क्रियाओं सहित वर्ष पर्यंत आयोजित होने वाले व्रत, पर्व तथा उत्सवों पर आधारित है, जो कि मौसम के अनुरूप निर्धारित चैत्र आदि मासों में आयोजित होते रहते हैं जिससे कि वर्ष पर्यन्त मानव जीवन एवं समाज में निरंतरता और उत्साह का वातावरण बना रहे। यहॉं के व्रत पर्व आदि सभी उत्सवों में धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक सहित वैज्ञानिक समन्वय का अटूट सम्बन्ध दृष्टिगत होता है। इसीलिए यह अक्षुण्ण परंपरा शाश्वत रूप में अनादि काल से गतिमान है।

इसी के अंतर्गत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाए जाने वाली दीपावली का अपना एक विशिष्ट स्थान है। लोक प्रसिद्धि में प्रज्वलित दीपकों की पंक्ति / समूह से 'दीपावली' या 'दीपमालिका' शब्द की निष्पत्ति होती है। लौकिक आख्यानों के अनुसार प्रभु श्रीराम के अयोध्या वापस आने के उपलक्ष्य से संबंधित होकर आज भी दीपावली मनाई जाती है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक की अमावस्या को अर्धरात्रि के समय भगवती लक्ष्मी पृथ्वी लोक में भ्रमण करती है तथा स्वच्छ, शुद्ध और दीपों से सुशोभित गृहों को देखकर वहाँ प्रसन्नता पूर्वक स्थायी रूप से निवास करती हैं।

सामाजिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से दीपावली स्वच्छता का विशेष पर्व है जिसके आगमन पर लोग अपने घर-द्वार के सहित अपने आस पास की भी विधिवत सफाई करते है जो कि स्वस्थ समाज का प्रमुख आधार है। इसके अतिरिक्त कृषि प्रधान इस राष्ट्र में खरीफ की फसलें भी इसी समय उत्पन्न होती हैं जिन से समृद्ध सभी लोग वस्तु विनिमय द्वारा एक दूसरे की आवश्यक आवश्यकताओं की संपूर्ति करते हैं जिससे कि समाज में सामंजस्य एवं एकरूपता का वातावरण बना रहे।

सर्व विदित है कि वर्षा ऋतु में हम अपने घरों की सफाई ठीक से नहीं कर पाते जिससे हमारे घरों में एव हमारे आसपास कई तरह की गंदगी और जलजमाव होकर विभिन्न प्रकार की महामारी आदि रोगों के कारक रूपी कीड़े-मकोड़े आदि की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। अतः तीव्र शीत के आगमन के पूर्व अपने घरों सहित आसपास की अच्छी तरह से सफाई करते हुए एक शुभ एवं स्वस्थ वातावरण के निर्माण हेतु भी कार्तिकी अमावस्या को दीपावली लगाना अत्यंत हितकारी होता है। क्योंकि दीपावली में प्रत्येक जगह सुसज्जित तेल दीपों की श्रृंखलाओं में वर्षा ऋतु के उत्पन्न कीट पतंग आदि विषाणु दीपक की लौ से आकृष्ट होकर उसके पास जाते हैं तथा स्वयं ही जलकर नष्ट हो जाते हैं जिससे पृथ्वी रोग कारक इन कीड़े मकोड़ों से मुक्त होकर स्वस्थ एवं समृद्ध हो जाती है।

धार्मिक दृष्टि से दीपावली की रात्रि में विष्णुप्रिया लक्ष्मी सद्गृहस्थों के घरों में विचरण कर यह देखती हैं कि हमारे निवास योग्य घर कौन कौन से हैं? और जहाँ कहीं उन्हे अपने निवास की अनुकूलता दिखायी पड़ती है, वहीं रम जाती हैं। अत एव मानव को दीपावली के दिन अपना घर ऐसा बनाना चाहिये जो भगवती लक्ष्मी के मनोनुकूल हो और जहाँ पहुँचकर वे अन्यत्र जाने का विचार भी अपने मन में न लायें। जीवन यदि वैभव से विहीन है तो उसका कोई मान-सम्मान नहीं होता परन्तु महालक्ष्मी पूजन से घर-परिवार में वैभव की प्रतिष्ठा की जा सकती है। क्योंकि धन सम्पन्नता वर्तमान जीवन का एक बड़ा सच है तथा आजकल मानव जीवन के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चतुर्विध पुरुषार्थों में कामादि तीन अन्य पुरुषार्थों की सिद्धि का साधन भी है। अतः दीपावली पर्व पर घर की शुद्धता के मूल में आरोग्यता, सुख, स्वास्थ्य, सौभाग्य और सम्पदा की सिद्धि ही है।

दीपावली में गजाभिषिक्त लक्ष्मी की आराधना से इष्ट सिद्धि होती है। वास्तुशास्त्र के ग्रन्थों में पूजा के लिए गजाभिषिक्त लक्ष्मी की प्रतिमा बनवाकर घर या देवालय में पूजन करने का विधान किया गया है। यह प्रतिमा 11 अंगुल से कम होनी चाहिये। कमल के आसन पर विराजित और दोनो ही ओर हाथियों द्वारा जलाभिषेक वाली निश्चला लक्ष्मी की पूजा करने से घर में स्थायी वैभव की प्रतिष्ठा होती है। इसके लिए आगमोक्त विधान को स्वीकार किया जाना चाहिए। लक्ष्मी गायत्री मंत्र का निरंतर जाप भी इष्टप्रद है। मंत्र यह है- "ऊँ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्"। दीपावली के अवसर पर जप करने से यह शीघ्र ही सिद्ध हो जाते हैं।

मनुष्यालय चंद्रिका में स्पष्ट किया गया है कि घर के द्वार की चौखट पर गणेश के साथ ही पद्मालया या लक्ष्मी की प्रतिष्ठा कर पूजन करना चाहिये। इससे वास्तुदोषों, वेध का निवारण होकर यश व वैभव की वृद्धि होती है। गृहस्थ को सदा ही कमलासन पर विराजित लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये। देवी भागवत में कहा गया है कि कमलासन पर विराजित लक्ष्मी की पूजा से इन्द्र ने देवाधिराज होने का गौरव प्राप्त किया था। इन्द्र ने लक्ष्मी की आराधना "ऊँ कमलवासिन्यै नम:" मंत्र से की थी। यह मंत्र आज भी अचूक है। दीपावली को अपने घर के ईशानकोण में कमलासन पर मिट्टी या चांदी की लक्ष्मी प्रतिमा विराजित कर, श्रीयंत्र के साथ यदि उक्त मंत्र से पूजन किया जाय और निरंतर जाप किया जाए तो चंचला लक्ष्मी स्थिर होती है। बचत आरंभ होती है, पदोन्नति मिलती है। साधक को अपने सिर पर बिल्वपत्र रखकर श्रीसूक्त का पाठ करने से इच्छित कार्य शीघ्र सिद्ध होते हैं, लक्ष्मी की अवश्य प्राप्ति होती है।

कार्तिक कृष्ण अमावस्या (दीपावली के दिन) प्रातः स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर... 'ममसर्वापच्छन्तिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादिसकलशुभफलप्राप्त्यर्थं गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्धयर्थं इन्द्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।' यह संकल्प करके दिनभर व्रत रखें और सायं काल के समय पुन: स्नान करके पूर्वोक्त प्रकार की 'दीपावली' 'दीपमालिका' आदि बनाकर कोषागार (खजाने) में या किसी भी शुद्ध, सुन्दर, सुशोभित और शान्तिवर्द्धक स्थान में पर अक्षतादि से अष्टदल लिखे और उसपर लक्ष्मी का स्थापन करके 'लक्ष्म्यै नम:' 'इन्द्राय नम:' और 'कुबेराय नम:' - इन नामों से पृथक् -पृथक् (या एकत्र) यथाविधि पूजन क्रम में 'नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरे: प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां या सा मे भूयात्वदर्चनात्।।' इस मंत्र से 'लक्ष्मी' की 'ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबल:। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नम:।।' से 'इन्द्र' की और 'धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवन्त त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पद:।।' मंत्र से 'कुबेर' की प्रार्थना करे। उसके बाद रात्रि के शेष भाग में सूप (छाजला) और डिंडिंम (डमरू) आदि को वेग से बजाकर अलक्ष्मी को निकाले।

महाभारत में देवी रुक्मिणी के यह पूछने पर कि 'हे देवि! आप किन- किन स्थानों पर रहती हैं, तथा किन - किन पर कृपा कर उन्हे अनुगृहीत करती हैं? के उत्तर में स्वयं देवी लक्ष्मी बताती हैं कि - मैं उन पुरुषों के घरों में निवास करती हूँ जो सौभाग्य शाली, निर्भीक, सच्चरित्र तथा कर्तव्य परायण हैं। जो अक्रोधी, भक्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्त्वसम्पन्न होते हैं। जो स्वभावत: निज धर्म, कर्तव्य तथा सदाचरण में सतर्कतापूर्वक तत्पर होते हैं। धर्मज्ञ और गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते हैं। मन को वश में रखने वाले, क्षमाशील और सामर्थ्य शाली हैं। इसी प्रकार मुझे उन स्त्रियों के घर प्रिय हैं जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय, सत्य पर विश्वास रखने वाली होती हैं तथा जिन्हे देखकर सबका चित्त प्रसन्न हो जाता है। जो शीलवती, सौभाग्यवती, गुणवती, पतिपरायणा, सबका मंगल चाहने वाली तथा सद्गुणसम्पन्ना होती हैं। भगवती लक्ष्मी किन व्यक्तियों के घरों को छोड़कर चली जाती हैं, इस विषय में वे स्वयं देवी रुक्मिणी से कहती है कि जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्ण शंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनों के दोष देखने वाला हो, उसके भीतर मैं निवास नही करती हूँ। जिनमें तेज, बल, सत्व और गौरव की मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहाँ तहाँ हर बात में खिन्न हो उठते हैं, जो मन में दूसरा भाव रखते हैं और ऊपर से कुछ और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्यों के घर में मै निवास नही करती हूँ। इसी प्रकार उन स्त्रियों के घर भी मुझे प्रिय नहीं जो नारियाँ अपने गृहस्थी के सामानों की चिन्ता नहीं करती, बिना सोचे-विचारे काम करती हैं, पति के प्रतिकूल बोलती हैं, पराये घर में अनुराग रखती हैं, निर्लज्ज पापकर्म में रुचि रखने वाली, अपवित्र चटोरी अधीर, झगड़ालू तथा सदा सोने वाली हैं, ऐसी स्त्रियों के घर को छोड़कर चली जाती हूँ। उपर्युक्त गुणों का अभाव होने पर अथवा दुर्गुणों की विद्यमानता होने पर भले ही कितने ही सँभाल के साथ लक्ष्मी-पूजन किया जाय, भगवती लक्ष्मी का निवास उनके गृह में नही हो सकता। अतः इसके द्वारा हमारे धर्म ग्रंथो में शुद्ध आचरण, सदाचार, परोपकार आदि गुणों को धन प्राप्ति का बताते हुए सच्चरित्रता पर विशेष बजल दिया गया है जो कि भारतीय सामाजिक संरचना का मुख्य आधार है।

दीपावली के दिन सभी को दीपक जलाना चाहिये क्योंकि सामूहिक चेतना के सिद्धान्तानुसार एक साथ दीपक लगाकर प्रार्थना करने से मानसिक चिन्ता दूर होकर नैराश्य भाव की समाप्ति होती है तथा जीवन पथ पर उत्साह पूर्वज आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। वेदों के अनुसार अगर पवित्र विचारों के साथ मन से समूहिक रूप से विशेष प्रार्थना की जाए तो उसका सकारात्मक प्रभाव मिलता है।

अतः तमसो मा ज्योतिर्गमय के मूल सिद्धान्तानुसार जीवन के नैराश्य, अज्ञानता, ईर्ष्या, द्वेष, मासिक कलुषिता एवं पाप आदि अंधकार से उत्साह, ज्ञान, प्रेम, अनुराग एवं मासिक समृद्धि रूपी ज्ञान की ओर पदार्पण कराना ही दीपावली का मुख्य उद्देश्य है।

वर्तमान काल में इस दीपावली पर्व की उपादेयता और भी बढ़ जाती है क्योंकि आज समग्र विश्व जिस प्रकार कोरोना रूपी महान विभीषिका से ग्रस्त होकर निराशा रूपी दलदल में प्रविष्ट होती जा रही है वैसे वातावरण में यह दीपावली पर्व न केवल मानव समाज अपितु सम्पूर्ण जीव मात्र के लिए एक वरदान साबित होगी क्योंकि हमारे यहां दीप को प्रत्यक्ष देवता और साक्षात जगत स्रष्टा परमब्रह्म रूप में प्रतिष्ठापित करते हुए इसकी सास्वत आराधना की गई है अतः दीपक ज्योति को अपने अंतःकरण में स्थापित करते हुए अपने मन को परम ब्रह्म की चरणों में समर्पित कर देने से जीवन की परम उद्देश्य की पूर्ति होगी तथा निश्चय ही सामाजिक, आर्थिक एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से समाज में एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण एवं मानव समाज का कल्याण होगा।

अतः हम सभी को स्वास्थ्य मन से संपूर्ण उत्साह के साथ दीपावली का आयोजन करना चाहिए तथा समाज के वंचित एवं उपेक्षित वर्ग की सहायता करते हुए उन्हें भी दीपावली रूपी उत्साह को अपने जीवन में लाने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए यही हमारी भारतीय संस्कृति और परंपरा है और यही इसमें अंतर्निहित समाजिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अवधारणा भी है जिसमें समग्र विश्व ही एक परिवार के रूप में परिगणित हैं और एक दूसरे की सहायता हमारा परम कर्तव्य एवं धर्म है।

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