बिहार में सूर्योपासना का महापर्व छठ कल से शुरू



--अभिजीत पाण्डेय (ब्यूरो),
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

बिहार में लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व कार्तिक छठ कल यानि बुधवार से नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा। सूर्योपासना के इस पवित्र चार दिवसीय महापर्व के पहले दिन छठव्रती श्रद्धालु नर-नारी अंत:करण की शुद्धि के लिए कल नहाय-खाय के संकल्प के साथ नदियों-तालाबों के निर्मल एवं स्वच्छ जल में स्नान करने के बाद शुद्ध घी में बना अरवा भोजन ग्रहण कर इस व्रत को शुरू करेंगे।

महापर्व छठ को लेकर बिहार के सुदूर क्षेत्रों तक घर से घाट तक तैयारियां जोरों पर है। व्रती घर की साफ-सफाई के साथ व्रत के लिए पूजन सामग्री खरीदने में जुट गए हैं। कोई व्रती अपने घर में नहाय-खाय के लिए चावल चुनने में लगी हैं तो कोई छत पर गेहूं सुखाने में लगी हैं। छठ व्रतियों के लिए गंगा घाटों को साफ-सुथरा और सजाने के काम में स्थानीय प्रशासन के अलावा विभिन्न इलाकों की छठ पूजा समिति और स्वयं सेवक भी लगे हुए है। इसके साथ ही नदी और तालाब की ओर जाने वाले प्रमुख मार्गों पर तोरण द्वारा बनाए जा रहे है और पूरे मार्ग को रंगीन बल्बों से सजाया जा रहा है।

महापर्व के दूसरे दिन श्रद्धालु दिन भर बिना जलग्रहण किए उपवास रखने के बाद सूर्यास्त होने पर पूजा करते हैं और उसके बाद एक बार ही दूध और गुड़ से बनी खीर खाते हैं तथा जब तक चांद नजर आए तब तक पानी पीते हैं। इसके बाद से उनका करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।

लोक आस्था के इस महापर्व के तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी और तालाब में खड़े होकर प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं। व्रतधारी डूबते हुए सूर्य को फल और कंदमूल से अर्घ्य अर्पित करते हैं। महापर्व के चौथे और अंतिम दिन फिर से नदियों और तालाबों में व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देते हैं। भगवान भाष्कर को दूसरा अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही श्रद्धालुओं का 36 घंटे का निर्जला व्रत समाप्त होता है और वे अन्न ग्रहण करते हैं। दीपावली के छह दिन बाद सूर्य की उपासना का पर्व छठ कल बुधवार से शुरू हो रहा है जिसमें डूबते और उगते सूर्य की पूजा की जाती है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी समेत अन्य हिस्सों खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाले इस पर्व में सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य देने वाली महिलाओं और पुरूषों का 36 घंटे से ज्यादा का व्रत गुरूवार शाम से शुरू हो जाएगा। छठ की शुरूआत तो कल से होगी लेकिन सूर्य को अर्घ्य 20 नवम्बर की शाम और 21 की सुबह दिया जाएगा।

बुधवार को नहाय खाय से शुरू होगा इस दिन पर्व की शुरुआत होती है, जिसमें लौकी दाल और चावल बनता है। उसके अगले दिन खरना होता है जिसमें खीर और पूरी बनती है। छठ करने वाली महिलाएं और पुरूष खरना की खीर खाकर व्रत की शुरूआत करते हैं। दो दिन बाद सुबह का अर्घ्य देने के पश्चात ही अन्न और जल ग्रहण करते हैं।

छठ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रमुख पर्व है जो अब देश के अन्य हिस्सों में भी मनाया जाने लगा है। मुम्बई और कोलकाता में बड़ी संख्या में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग रहते हैं। इन दो महानगरों में भी छठ धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 1984 के पहले लोग छठ पूजा के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन उस साल अखिल भारतीय भोजपुरी समाज की ओर से चार पांच लोगों ने मिलकर इस पर्व को लक्ष्मण मेला मैदान में मनाया।

सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं।

लोक परंपरा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की। यह पर्व चार दिनों का है। भैयादूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरम्भ होता है। व्रति दिनभर अन्न-जल त्याग कर रात्रि में खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं।

तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाये जाते हैं। अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं।

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पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है और इसलिए छठ पूजा की जाती है। छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना क्यों की जाती है इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। एक मान्यता के मुताबिक छठ की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। जिसकी शुरुआत सूर्यपुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण हर दिन घंटों तक कमर तक पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। ऐसा माना जाता है कि सूर्य देव की कृपा से ही वो महान योद्धा बने। आज भी छठ में इसी परंपरा के तहत अर्घ्य देने की रीत है।

वहीं एक और मान्यता के अनुसार, राजा प्रियंवद जो नि:संतान थे। उन्हें तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। राजा ने रानी मालिनी को यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रूप में दी। जिसके प्रभाव से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन वह बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। पुत्र वियोग में डूबे राजा प्रियंवद अपने मृत्य पुत्र के शरीर को लेकर श्मशान चले गए और अपने प्राण को त्यागने का प्रयास करने लगे। तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई। उन्होंने प्रियंवद से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण ही मैं षष्ठी कहलाती हूं। उन्होंने राजा से कहा कि हे राजन तुम मेरा पूजन करो और दूसरों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा की भावना से सच्चे मन के साथ देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। तब से लोग संतान प्राप्ति के लिए छठ पूजा का व्रत करते हैं।

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