पेशावरियों ने जब जिन्ना का पर्दा हटा दिया था!



--के• विक्रम राव,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

पख्तून मुसलमान, खासकर पेशावरी, सब गांधीवादी थे। अहिंसक थे। भारतसंघ में ही रहना चाहते थे। अत: आज वहां हो रहे तशद्दुद से हर भारतीय को वेदना होना स्वाभाविक है। गत दिनों हिमालयी नगर पेशावर खराब कारणों से सुर्खियों में रहा। महाभारतीय जनपद पुरुषपुर के संस्थापक गांधार नरेश, कौरवों के मातुल शकुनि से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना की सल्तनतों का भूभाग रहे आधुनिक पेशावर में पाकिस्तानी तालिबानियों ने हाल ही में 180 आस्थावान मुसलमानों को भून डाला। अत: अचरज होता है कि क्यों गत माह इसी शहर की दो ऐतिहासिक जर्जर हवेलियों को संरक्षित करने हेतु पाकिस्तानी पुरातत्व निदेशालय ने व्यापक प्रयास शुरु कर दिया। ये कभी सांसद और नाट्यशास्त्री स्व• पृथवीराज कपूर तथा 97—वर्षीय फिल्मी हीरों रहे मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के पुराने आवास किस्सा ख्वानी बाजार में थे, जहां उन्होंने अपना यौवन बिताया था।

पेशावर की ही एक पुरानी मशहूर घटना थी कि इस्लाम के नाम पर एक प्राचीन राष्ट्र को खण्डित करने वाले गुजराती हिन्दू बनिया जीणाभाई के पोते मोहम्मद अली जिन्ना को यहां की मुगलाई मस्जिद (शाहजहां द्वारा निर्मित) में नमाज अता करने हेतु हार्दिक नागरिक आमंत्रण दिया गया था। मगर इस्लाम का यह ''अकीदतमंद'' पुरोधा भाग गया, नदारद रहा। सहनमाजी घण्टों उसकी प्रतीक्षा करते रहे।

पेशावर का भारत राष्ट्र से आत्मीय लगाव था क्योंकि यह सीमांत गांधी, शेरे—अफगन, उतमंजायी जाति के स्वाधीनता सेनानी, सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के खुदाई खिदमतगार (लालकुर्ती वाले) का कार्यस्थल था। अंग्रेज साम्राज्यवादी यहां केवल जेल के विस्तारीकरण में व्यस्त रहे। क्योंकि स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों, सत्याग्राहियों की संख्या अपार थी।

अंग्रेजी उपनिवेशवादियों तथा देश—विभाजक मोहम्मद अली जिन्ना के उद्भव के दशकों पूर्व पेशावर (खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी) समृद्ध थी। यहां यूनान के सिकंदर का सेनापति सेल्युकस निकाटोर हारा था। उसकी पुत्री हेलेन मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त (पटना वाले) की व्याहता हो गई थी। मशहूर कनिष्क स्तूप यही का है। ठीक हजार वर्ष पूर्व (1024) तुर्की शासक गुलाम सुबुक्तगिन के पुत्र महमूद गजनी ने सोमनाथ शिवलिंग को लूटने के पहले पेशावर को लूटा था। साहित्य प्रेमियों के लिए बतादूं संस्कृत भाषा के अष्टाध्यायी नामक प्रसिद्ध सूत्रबद्ध व्याकरण ग्रंथ के रचयिता शिवभक्त मुनि पाणिनी की यह तपोभूमि थी। अपनी अभिनयकला को पृथ्वीराज कपूर यहीं विकसित करते थे। प्राचीन यूनान के नाट्यकार सोफोक्लिस की चर्चित त्रासद नाट्यकृति एंटिगोन पेशावर में शिलापट्ट पर लिखी मिली थी। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की परम्परा में इसका भी अध्ययन होता रहा है।

आधुनिक पेशावर को भारतीय इतिहास में ख्याति मिली जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के युवा नेता लोग स्वाधीनता संघर्ष में जनसभायें करते थे। बापू भी यहां आ चुके है। बादशाह खान का अधिक समय यहीं अंग्रेजों और पाकिस्तानी मुस्लिम लीग द्वारा संचालित पेशावर जेल में बीता था। उनके अग्रज डा• खान अब्दुल जब्बार खान (डा• खान साहेब) इस प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे। उनके पुत्र और कांग्रेस नेता खान अब्दुल वली खान ने पाकिस्तान में अपनी इस मातृभूमि के जबरन विलय का पुरजोर विरोध किया था। वली ने सीमांत प्रांत में राष्ट्रीय आवामी पार्टी बनायी थी।

उस काल में एक प्रमुख स्वाधीनता सेनानी थे ताज मोहम्मद खान मीर। वे दो बार ब्रिटिश जेल में कैद रहे। इनके गुरु थे सीमांत गांधी। मीर साहब का पुत्र है शाहरूख खान उर्फ बालिवुड का ''किंग खान''। वे नामी वकील थे, कंचनजंगा पर्वतमाला पर चढ़ चुके हैं। लम्बे कद के मीर साहब को फिल्म 'मुगले आजम' के निदेशक के• आसिफ ने राजा मान सिंह की भूमिका की पेशकश की थी पर उन्होंने इंकार कर दिया। तब अभिनेता मुराद (रजा के पिता) को वह दी गई। मीर साहब फिल्म को नौटंकी मानते थे। हालांकि इसी नौटंकी का नामी कलाकार उनके बेटे शाहरुख खान हो गये है। नेहरू सरकार ने मीर साहब को स्वाधीनता सेनानी होने के नाते एक दुकान आवंटित की थीं। वे दिल्ली में 19 सितम्बर 1981 तक जीवित थे।

इन ताज मोहम्मद मीर का जीवन का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रवादी और भारत—हितैषी कार्यक्षेत्र पेशावर था। उनके भाई गुलाम मोहम्मद गामा (शाहरुख खां के सगे चाचा) थे तब की राष्टवादी घटना है। उसी दौर में पाकिस्तान वाली मांग के अभियान में मोहम्मद अली जिन्ना पेशावर आ रहे थे। वे जोशखरोश से भारतीय मुसलमानों के लिए दारूल—इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान हेतु भारतव्यापी जद्दोजहद चला रहे थे। इसी के लिए जिन्ना पेशावर यात्रा पर भी आये। उस दिन ताज मोहम्मद मीर और भाई मोहम्मद अली गामा ने सारे पेशावर में पोस्टर लगवा दिये कि अकीदतमंद के सरबराह मियां मोहम्मद अली जिन्ना दोपहर के दो बजे शाहजहानी (मस्जिद मोहम्मद खान) में पधार कर नमाज अता फरमायेंगे। हजारों नमाजी मस्जिद में जमा हो गये। इधर जिन्ना समझ गये कि कुछ शरारतियों की यह खुराफात है। जिन्ना ने न कभी नमाज अता की, न कोई कुरान की आयात उन्हें याद थी। न किसी मजहबी रस्म का इल्म था। इसी वजह से मोहम्मद अली जिन्ना पेशावर के अपने गेस्ट हाउस में ही बैठे रहे। मस्जिद गये ही नहीं।

उधर मस्जिद में मियां गामा ने अपने लोगों को नमाजियों की भीड़ में पैठे रहने को कहा। ढाई बजे गये तो भीड़ ने ''जिन्ना साहब आओं'' के सूत्र पुकारे। जब जिन्ना नहीं आये तो भीड़ उनको गाली देते मस्जिद से चली गयी। खबर खूब छपी। इस घटना द्वारा शाहरुख के वालिद ताज मोहम्मद मीर तथा चाचा गामा ने दिखा दिया कि मुस्लिम लीग के अध्यक्ष और मुसलमानों के कायदे—आजम का दावा ठोकने वाले ढोंगी है। खुदा की इबाहतगाह से साफ कन्नी काट गये। भारतभर में जिन्ना की जोरदार फजीहत हुई (हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली, में चार कालम की हेडलाइन का फीचर) छपी।

फिल्म दर्शकों में सांप्रदायिकता—विरोधी लोग किंग खान पर बहुत नाज करते हैं कि अन्य खान अभिनेता की तुलना में वे सेक्युलर है, स्वाधीनता सेनानी, जिन्ना—विरोधी और देशभक्त ताज मोहम्मद मीर साहब के आत्मज है। ऐसे ही मुसलमान भारत के गौरव हैं।

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