क्‍या ममता समझती हैं लोकतंत्र की परिभाषा ?



--विजया पाठक (एडिटर - जगत विजन),
कोलकाता-पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ अराज‍कता में डूबा पश्चिम बंगाल

■ मारने-मरने पर उतारू ममता सरकार

अगले साल पश्चिम बंगाल में आम चुनाव होने वाले हैं। चुनावों के नजदीक आते ही प्रदेश की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी अपने तानाशाही रवैये की ओर बढ़ने लगी हैं। अपने शासन का पूरा इस्‍तेमाल कर पूरे राज्‍य में अराजकता का माहौल बना दिया है। विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर हमले, सामाजिक कार्यकर्ता, पुलिस द्वारा प्रताड़ित करना आम हो गया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार में इस समय कुछ भी ठीक नही चल रहा है। पूरे राज्‍य में अराजकता और दहशत का माहौल व्‍याप्‍त है। फिर चाहे वह राजनेता हो या आम आदमी। सभी भय के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो प्रदेश में एक दम से तानाशाही शासन का आगाज हो गया है। दिनदहाड़े हत्‍या, अपहरण जैसी वारदातें आम बात हो गई हैं। इससे पहले भी बंगाल में अन्‍य पार्टियों की सरकारें हुई लेकिन आज तक बंगाल में ऐसी अराजकता नहीं फैली। 2019 के लोकसभा चुनाव में जैसे ही बीजेपी ने यहां अपना परचम लहराना प्रारंभ किया ममता सरकार बदले की भावना से काम करने लगी। क्‍या नेता और क्‍या आमजन। सबके प्रति तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता हावी होने लगे। प्रदेश की जनता ने वामदलों के 25 वर्ष के शासन को नकारते हुए राज्‍य में ममता बनर्जी के हाथों में सत्‍ता सौंपी थी। लोगों ने उम्‍मीद लगाई थी‍ कि ममता सरकार के आने से प्रदेश में अमन चैन की लहर दौड़ेगी। प्रारंभ में ऐसा हुआ भी। लेकिन पिछले कुछ सालों से राज्‍य का माहौल बिगड़ता ही जा रहा है। ममता सरकार ने नक्‍सलियों के आतंक को भी पीछे छोड़ दिया है।

एनसीआरबी के आंकड़ों अनुसार, वर्ष 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़पों की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। इससे पहले यानी वर्ष 2015 में राजनीतिक झड़प की कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। वर्ष 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। हाल ही में प्रदेश भाजपा अध्‍यक्ष दिलीप घोष के काफिले पर हमला हुआ था। यह हमला उस वक्‍त हुआ जब वह पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार से गुजर रहे थे। उस दौरान कुछ उपद्रवियों ने उनके काफिले पर पत्थर फेंके। पत्थर लगने से उनकी गाड़ी के शीशे चकनाचूर हो गए। बीजेपी ने इस हमले के लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएमएम) के विमल गुरुंग गुट पर शक जताया है। इससे पहले 2019 में भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के काफिले पर हमला हुआ था। ऐसे ही एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता का मामला सामने आया था। इस महिला ने आरोप लगाया था कि ममता सरकार में उन्‍हें काम नहीं करने दिया जा रहा है। पुलिस प्रशासन द्वारा परेशान किया जा रहा है। निगरानी की जा रही है। महिला ने परेशान होकर राष्‍ट्रीय महिला आयोग दिल्‍ली में अर्जी तक लगाई है और अंदेशा जताया है कि उनकी ममता सरकार हत्‍या तक कर सकती है। वहीं सांसद अर्जुन सिंह के करीबी रहे भाजपा नेता मनीष शुक्ला की मोटरसाइकिल सवार अपराधियों ने 24 परगना जिले के बैरकपुर उप संभाग में टीटागढ़ के निकट गोली मारकर हत्या कर दी थी। भाजपा नेता की हत्या को लेकर राज्यपाल ने आरोप लगाया था, आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों को पश्चिम बंगाल पुलिस और मुख्यमंत्री ने पूरी तरह से त्याग दिया है। इस नृशंस कार्य का तरीका आतंक सहित सभी एंगल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बता रहा है। पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष के काफिले पर हुए इस हमले से पार्टी के नेताओं में रोष है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में लगातार भाजपा नेताओं पर हमला किया जा रहा है।

2014 से अब तक 115 भाजपा कायकर्ता बंगाल में राजनीतिक हिंसा का शिकार हुए हैं, जिसमें पुलिस द्वारा कोई प्रमाणिक कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस प्रशासन को भी सरकार का पूरा संरक्षण प्राप्‍त हो रहा है। वहीं मार्क्‍सवादी और वाम दलों के नेता भी खौंफजदा हैं। वह भी प्रदेश में बिगड़ रही कानून व्‍यवस्‍था को लेकर चिंतित हैं और ममता सरकार को सत्‍ता से बाहर करने में बीजेपी के साथ खड़े है। सत्ताधारी पार्टी का हस्तक्षेप भी राजनीतिक हिंसा का एक बड़ा कारण है। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि ‘रूल ऑफ लॉ’ को सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने अपनी मुट्ठी में कर लिया है और कानूनी व पुलिसिया मामलों में भी राजनीतिक हस्तक्षेप हो रहा है। यही वजह है कि पुलिस अफसर निष्पक्ष होकर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। बंगाल में राजनीतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे मुख्य तौर पर तीन वजहें मानी जा रही हैं- बेरोजगारी, विधि-शासन पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व और भाजपा का उभार।

दिनदहाड़े लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की हत्या ममता बनर्जी सरकार द्वारा की जा रही है। बंगाल में सरकार के संरक्षण में जिस तरह की उद्दंडता, अराजकता और खून-खराबा हो रहा है वो निश्चित तौर से किसी भी लोकतांत्रिक सिस्टम को शर्मसार करता है। अचंभे की बात है कि लोकतंत्र और जनतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाली ब्रिगेड अब बंगाल के मामले पर खामोश है। पिछले कुछ महिनों में ममता बनर्जी की सरकार में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ क्रूरता और राजनीतिक हिंसा में वृद्धि हुई है। बंगाल उसके प्रशासन के तहत जल रहा है, जो हिंसक तत्वों का संरक्षण करता है।

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि अब बंगाल की जनता को तय करना है कि परिवारवाद चाहिए या विकासवाद। बीजेपी बंगाल को विकास की राह पर ले जाना चाहती है, लेकिन ममता बनर्जी अपने भतीजे को अगला मुख्यमंत्री बनाना चाहती हैं। ममता बनर्जी ने प्रशासन का राजनीतिकरण किया है, राजनीति का अपराधीकरण किया है। बंगाल में तीन कानून हैं, अपने भतीजे के लिए, वोट बैंक के लिए, लोगों के लिए। बंगाल एकमात्र राज्य है जहां अभी भी सांप्रदायिक हिंसा जारी हैं। मुर्शिदाबाद में एक परिवार के सभी तीन सदस्यों, जिनमें आठ-वर्षीय बच्चा और उसकी गर्भवती मां भी शामिल हैं, को धारदार हथियारों से काट डाला गया। बताया जाता है कि इस परिवार का मुखिया आरएसएस का कार्यकर्ता था। मतलब साफ है कि ममता शासन में बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा जा रहा है। यदि यही लोकतंत्र की परिभाषा है तो हम कैसे कह सकते हैं कि हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं।

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