किसका होगा बंगाल: बीजेपी या टीएमसी ?



--विजया पाठक (एडिटर - जगत विजन),
कोलकाता-पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

● बीजेपी से खौफजदा हैं ममता बनर्जी !

● सता रहा है सत्‍ता जाने का डर !

2019 के लोकसभा चुनाव में ममता के गढ़ में भाजपा ने सेंध लगाई। लोकसभा सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद पश्चिम बंगाल तीसरा सबसे बड़ा सूबा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा ने जोरदार प्रदर्शन किया। वह 42 में से 19 सीटों पर विजयी रही। पिछली बार उसे 02 सीटें मिली थीं। वहीं, 2019 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। 2014 की बात करें तो लोकसभा चुनाव में टीएमसी को 34 सीटें मिली थीं।

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्‍ता परिवर्तन की पूरी उम्‍मीद लगाए बैठी है। बीजेपी की यह उम्‍मीद सच्‍चाई में भी बदल सकती है। क्‍योंकि पिछले कुछ वर्षों से प्रदेश में अच्‍छी पकड़ बनाए हुए है। जमीनी स्‍तर पर बीजेपी ने अपना गढ़ बना लिया है। जगह-जगह बीजेपी के कार्यकर्ता खड़े हो गए हैं। हम कह सकते हैं कि इस बार के विधान सभा चुनाव में मुख्‍य मुकाबला बीजेपी और टीएमसी में भी होने वाला है। वैसे प्रदेश में वामदल भी अपना वर्चस्‍व बनाए हुए हैं। अभी बीजेपी के सुशासन और टीएमसी के कुशासन के बीच मुकाबला होने वाला है। गौरतलब है कि बीजेपी की बंगाल में मजबूती कोई चमत्‍कार नही है। बीजेपी ने बंगाल में अपनी जमीन तलाशने की शुरूआत 2014 के पहले ही कर दी थी। एक रणनीति के तहत बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल का प्रभारी बनाकर भेजा गया है। जिम्‍मेदारी सौंपी कि राज्‍य में बीजेपी को खड़ा करना है। विजयवर्गीय ने भी अपनी कुशलता और कर्मठता से कम समय में बंगाल में बीजेपी को खड़ा कर दिया। जिसको हम 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम से समझ सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में करीब 30 फीसदी मुसलमान और 24 फीसदी दलित हैं। दोनों ही समुदायों में टीएमसी का जनाधार काफी घटा है। ममता बनर्जी को गलतफहमी है कि मुस्लिम वोट टीएमसी के साथ खड़ा है लेकिन यह सच्‍चाई नही है। टीएमसी में मुस्लिमों का रूझान घटा है। वामदल के प्रति मुस्लिमों का रूझान बढ़ा है। अब बीजेपी के लिए जरूरी है कि वह वामदलों को साथ लेकर ममता के विरूद्ध लड़ाई लड़े तो निश्चित रूप से बीजेपी और वामदलों को लाभ होगा। यदि आवश्‍यक हो तो बीजेपी बंगाल में गठबंधन बनाकर भी चुनाव मैदान में उतर सकती है। वैसे इस बार भाजपा को पश्चिम बंगाल से बड़ी सफलता की उम्‍मीद है।

वहीं, ममता भी अपनी जमीन को बचाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्‍य में देखा जाए तो टीएमसी के लिए यह चुनाव बड़ा मुश्किल होने वाला है। प्रदेश की जनता में ममता की जो छवि बनी थी वह धुंधली होती जा रही है।

हम जानते हैं कि बंगाल में उद्योग-धंधे कम हैं। जिससे रोजगार के अवसर नहीं बन रहे हैं। जबकि जनसंख्या बढ़ रही है। खेती से बहुत फायदा नहीं हो रहा है। ऐसे में बेरोजगार युवक कमाई के लिए राजनीतिक पार्टी से जुड़ रहे हैं ताकि पंचायत व नगरपालिका स्तर पर होने वाले विकास कार्यों का ठेका मिल सके। स्थानीय स्तर पर होने वाली वसूली भी उनके लिए कमाई का जरिया है। वे चाहते हैं कि उनके करीबी उम्मीदवार किसी भी कीमत पर जीत जाएं। इसके लिए अगर हिंसक रास्ता अपनाना पड़े, तो अपनाते हैं। असल में यह उनके लिए आर्थिक लड़ाई है। इसका कारण भी स्‍पष्‍ट है कि ममता सरकार प्रारंभ से ही उद्योगों के प्रति गंभीर नहीं है। यहां तक कि वह टाटा नैनो के प्रोजेक्‍ट को भी अपने प्रदेश में नहीं बचा पायी। उस समय यह मामला काफी उछला था। मीडिया रपट बताती हैं कि तृणमूल की हिंसा का जवाब विपक्षी पार्टियां खासकर भाजपा ही दे रही है। खासतौर से उत्तर बंगाल में तृणमूल के लिए भाजपा चुनौती बनकर उभरी है।

बंगाल में अब मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है। दूसरी ओर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में वोट प्रतिशत बढ़ने के बाद भाजपा ने बंगाल में वोटों का ध्रुवीकरण तेज कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस भाजपा का खौफ दिखाकर मुसलमानों का वोट अपने पक्ष में कर रही है। इससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव और बढ़ेगा व बंगाल हिंसा की आग में झुलसेगा। इससे आने वाले समय में सांप्रदायिक झड़पें भी बढ़ेंगी, जो राज्य की सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। राज्य में राजनीतिक हिंसा भले ही नई बात न हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस विरोधी पार्टियों पर जिस तरह हमले कर रही है, वह बंगाल के लिए एकदम नया है। 60-70 के दशक में अजय मुखर्जी के मुख्यमंत्री रहते हुए बंगाल में कांग्रेस व वामदल के बीच चले हिंसक दौर में भी विपक्षी पार्टियों पर इस तरह हमले नहीं होते थे। अभी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस विपक्षी पार्टियों को पूरी तरह खत्म कर देने पर अमादा है। सत्ताधारी पार्टी जो कर रही है, उससे साफ है कि वह विपक्षी पार्टियों से खौफ खा रही है। लेकिन, राजनीतिक लड़ाइयां लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जानी चाहिए। ममता बनर्जी तानाशाह बनकर एक तरफ विपक्षी पार्टियों पर हमले करवा रही हैं और दूसरी तरफ केंद्र सरकार के खिलाफ लोकतांत्रिक फ्रंट भी तैयार करना चाहती हैं। ऐसे में उन पर यह सवाल उठेगा कि लोकतांत्रिक फ्रंट बनाने वाली ममता बनर्जी खुद कितनी लोकतांत्रिक हैं?

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