हाथ से सरकती सत्ता से बौखलाई ममता, बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हथियार बंद हमला



--विजया पाठक, (एडिटर - जगत विजन)
कोलकाता-पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

वर्ष 2021 की शुरूआती छह महीने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए बहुत अहम साबित होने वाला है। जितना अहम यह ममता के लिए होगा उससे कहीं ज्यादा अहम यह भारतीय जनता पार्टीपा के लिए भी होगा। क्योंकि यहां 292 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। एक ओर जहां वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी सरकार बचाए रखने के लिए साम दंड भेद अपना रही है। वहीं बिहार में सरकार बनाने के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल में ममता की सरकार को उखाड़ फेंकने के मकसद से बंगाल में आमद दे चुकी है। भाजपा नेताओं की इस हुंकार से बौखलाए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता और भाजपा कार्यकताओं के बीच काफी झड़प चल रही है। सत्ता के मद में खोने को आतुर यह कार्यकर्ता एक दूसरे की जान लेने से भी पीछे नहीं हट रहे। लगभग तीन दिन पहले बंगाल के बर्धमान जिले के आसनसोल स्थित जामग्राम में रैली के दौरान बम भी फेंके गए। बंगाल में हुई एक हिंसक झड़प में भाजपा के सात कार्यकर्ता घायल हो गए। चुनावी मैदान में इस तरह की घटनाएं कोई नई नहीं है, लेकिन सत्ता के मद में चूर ममता सरकार के कार्यकर्ता किसी की जान लेने को पीछे हटते नहीं दिखाई देते।

ममता सरकार की अराजकता का प्रमाण सोमवार को तब दिखाई दिया जब सिलीगुड़ी में भाजपा नेताओं द्वारा उत्तरकन्या घेराव सचिवालय का घेराव किया जा रहा था तभी ममता ने प्रशासकीय हथकंडों को अपनाते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय, तेजस्वी सूर्या, नितिश प्रमाणिक, डॉ• सुकांता सहित अन्य नेताओं पर पुलिस द्वारा आंसू गैस के गोले छुडवाए और ममता के गुंडे ने बम चलाए। इस दौरान कई भाजपा नेता बुरी तरह से घायल भी हुए।

ममता बनर्जी की यह बौखलाहट जायज भी है। इतने सालों से सत्ता पर जमी बैठी ममता को अब यह एहसास हो गया है कि इस बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की राह इतनी आसान नहीं है जितना वो समझती है। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में जहां तृणमूल कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और भाजपा को 10.16 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 3 सीटें ही मिली थीं। वहीं, 2019 आते-आते परिस्थितियां बदल गईं और लोकसभा चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

टीएमसी की बौखलाहट को धुंआ देने का काम किया है एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने। हाल ही में औवेसी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कूदने का एलान कर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ओवैसी की पार्टी के आने से टीएमसी का अल्पसंख्यक वोट कटेगा। देखा जाए तो देशभर में कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में ओवैसी की पार्टी के आने से मुस्लिम वोटों का बंटवारा संभव है। हालांकि ममता बनर्जी ने औवेसी को खुली चुनौति देते हुए दावा किया है कि ओवैसी का असर सिर्फ हिन्दी और उर्दू भाषी मुस्लिमों पर है, बंगाल के मुस्लिमों को लुभाना उनके बस की बात नहीं।

देखा जाए तो ममता के पश्चिम बंगाल में नई पारी शुरु करने में उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और लोगों पर उनके द्वारा किया गया अत्याचार और उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप रास्ते का रोड़ा बन सकते है। ठीक उसी तरह जैसे बिहार में लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी प्रसाद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण लालू प्रसाद यादव को काफी मुसीबतें झेलनी पड़ी। अब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ती नजर आ रही है। खैर यह तो आने वाला समय बताएगा कि ममता अपने सिरमौर को बचाने में कामयाब होती है या फिर भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी विजय पताका लहराती है।

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