नेताजी बाबू सुभाष चन्द्र बोस को कृतज्ञ राष्ट्र की विनम्र श्रद्धांजलि



--परमानंद पांडेय,
अध्यक्ष - अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास,
राष्ट्रीय संयोजक - मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच, उत्तर भारत।

■ भारत सरकार ने नेताजी बाबू सुभाषचन्द्र बोस के जन्म दिन को पराक्रम दिवस घोषित किया है

■ 23 जनवरी भारत का पराक्रम दिवस

भारत सरकार ने नेताजी की जन्म जयंती दिवस को राष्ट्र का पराक्रम दिवस घोषित किया है। ऐसा करके मोदी सरकार ने पूरे राष्ट्र की ओर से सुभाष बाबू को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है। इस वर्ष 23 जनवरी को नेता जी की 125वीं जन्म जयंती का आयोजन होने जा रहा है। भारत सरकार एक वर्ष तक नेतानी की 125वीं जन्म जयंती का आयोजन करेगी। इसके लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है जिसमें रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री आदि विशिष्ट लोगों को रखा गया है।

वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही। कभी उस सरकार ने नेताजी को महत्व नहीं दिता। कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह आदि सेनानियों को सम्मानित नहीं किया। वस्तुतः नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। उन्होंने विदेश में रह कर भारत सरकार का गठन कर लिया था जिसे कई देशों ने मान्यता दे दी थी। सुभाष बाबू ने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। इन्हें सदा एक स्कॉलर एक सोल्जर और एक स्टेट्समैन के रूप में याद किया जाता है।

सुभाष बाबू कभी कांग्रेस में भी रहे थे। एक बार झारखंड के रामगढ़ में कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ। सुभाष बाबू को कांग्रेस का रासब्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैय्या को प्रबल बहुमत से पराजित किया था। गांधी जी नहीं चाहते थे कि सुभाष बाबू को अध्यक्ष बनाया जाए। किन्तु गांधी जी की इच्छा के विपरीत कांग्रेसजनों ने गांधी जी की इच्छा को नकारते हुए सुभाष बाबू को चुना। हम सोच सकते हैं कि सुभाष बाबू की लोकप्रियता उस समय कितनी अधिक थी।

पर गांधी जी ने दूसरे ही दिन अपना बयान समाचारपत्रों में दिया कि पट्टाभि सीतारमैय्या की हार मेरी हार है। इस बयान के सार्वजनिक होने के तुरंत बाद सुभाष बाबू ने त्यागपत्र दे दिया और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। वे गांधी जी का आदर करते थे और जानते थे कि गांधी जी की भावना के विपरीत कांग्रेस में रहकर वे कुछ कर नहीं पाएंगे।

इस प्रकार सुभाष बाबू ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दूसरे रास्ते को अपनाया। अलग से सेना का गठन किया। जोरदार लड़ाई छेड़ दी। आजाद हिन्द फौज का गठन एक दूरदृष्टि भरा कदम था। आज भी आजाद हिन्द फौज के कुछ सेनानी जीवित है।

जब मोदी जी आए तो उन्होंने अंडमान में जाकर प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेताजी की स्मृतियों को सम्मानित किया।

अब उनकी जन्म जयंती की तिथि को राष्ट्र का पराक्रम दिवस घोषित कर मोदी जी ने राष्ट्र की ओर से ऋण चुकाया है। पराक्रम शब्द भी सही है। नेताजी पराक्रम के जीवंत प्रतीक थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के क्रम में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सर्वोपरि होना चाहिए। भारत की स्वतंत्रता के लिए जो वातावरण पूरी दुनिया में सुभाष बाबू ने बनाया उसकी वजह से ही अंग्रेजों ने भारत को आजाद जल्द किया और भारत छोड़ कर चले गए।

ऐसी परंपरा बन जाये कि स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस की तरह पराक्रम दिवस का भी आयोजन होता रहे।

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