घातक बीमारियों के लिए राइबोसोम होगा वरदान - प्रो• फ्रैंक



--- हरेन्द्र शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी।

▪☆▪ बीएचयू के स्वतन्त्रता भवन में प्रो• जोचिम फ्रैक नोबेल लारिएट का व्याख्यान

वाराणसी, 06 नवम्बर। घातक बीमारियों के लिए राइबोसोम पद्ति वरदान साबित होगा। राइबोसोम के जरिए विभिन्न गंभीर से गंभीर रोगों का उपचार संभव है। यही नहीं इसकी सहायता से घातक से घातक बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं का इजाद किया जा सकता है। दरअसल यह हर कोशिका में होता है और इसके कई खंड होते हैं। यह बात काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में आयोजित व्याख्यान में नोबेल लारिएट प्रो• जोचिम फ्रैंक ने कही।

उन्होंने कहा कि जीवाणु, पौधे, जानवर और मनुष्य सभी एक ही प्रकार की संरचना कोशिका से बने होते हैं। ये कोशिकाएँ प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक प्रकार की होती हैं। कोशिकाएँ अपनी ज्यादातर उर्जा का उपयोग प्रोटीन संश्लेषण में करती हैं। उदाहरण स्वरूप विभिन्न उपकरणों जैसे - एटीपी सिंथिटेज, प्रोटिआॅसोम, आरएनए पाॅलीमरेज, राइबोसोम, चेपरान्स एवं फ्लैजिलर मोटर को बताया, जो कि इसका उपयोग करती हैं। प्रत्येक प्रोटीन विशेष होती है परन्तु इनकी बहुत सी प्रतिकृतियाँ कोशिकाओं में पाई जाती हैं। ये प्रतिकृतियाँ द्विआयामीय या त्रिआयामीय हो सकती हैं। प्रत्येक प्रोटीन अमीनो एसिड के द्वारा प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक संरचना बनाती हैं। इनकी संरचनाएँ प्रतीकात्मक बनाम वास्तविक वस्तु के द्वारा समझी जा सकती हैं, जो कि वाह्य त्वचा, बाल-स्टिक एवं रिबन के द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं। उन्होंने फ्रांसिस क्रिक द्वारा दिए गए सेन्ट्रल डोग्मा पर भी चर्चा की और बताया कि आण्विक उपकरणों की सहायता से ट्रांसक्रिप्शन एवं ट्रांसलेशन क्रियाएँ अंत में प्रोटीन का निर्माण करती हैं। प्रत्येक कोशिका में सूचना होती है कि कौन सा जीन डीएनए से पूर्ण प्रोटीन का संश्लेषण करेगा, परन्तु यह कोशिका की विशेषता पर निर्भर करता है। प्रत्येक अमीनो एसिड के लिए एक निश्चित जेनेटिक कोड होता है, जो कि ए टी जी सी बेस में से किन्हीं तीन बेस के संयुग्मन से बनता है। प्रोटीन की भाषा में अमीनो एसिड शब्द की तरह होते हैं एवं स्वयुग्मन के द्वारा यह एक भाषा से दूसरे भाषा में परिवर्तित होते हैं। टी-आरएनए को रिबन संरचना या घनत्व मानचित्र के द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं, परन्तु घनत्व मानचित्र का रिज्यूलेशन कम होता है। एम-आरएनए के शब्दों की पहचान टी-आरएनए के द्वारा की जाती है और उसी के अनुरूप पूरक शब्द का बेस युग्मन किया जाता है। राइबोसोम इन पूरी क्रियाओं में परिवर्तक का काम करता है, जिसकी खोज 1955 में जाॅर्ज पैलेडे ने की थी। ये राइबोसोम्स रफ एन्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम पर स्थित होते हैं तथा आकार में अति-सूक्ष्म होते हैं। आकार इनका 25 नैनोमीटर होता है, जो कि मनुष्य के सर के बाल के व्यास का 1/3 हजारवाँ भाग होता है। इनको प्रकाश सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है, लेकिन यह चित्र साफ नहीं होता है। एक्स-रे क्रिस्टैलोग्राफी की सहायता से इसको देखा जा सकता है, परन्तु विभिन्न अवस्थाओं में इसका क्रिस्टल बनाना संभव नहीं है। इसलिए, इन्होंने क्रायोइलेक्ट्रान माइक्रोस्कोपी तकनीक की सहायता से राइबोसोम को चित्रित किया। इस तकनीक में इन्होंने विभिन्न आयामों से प्राप्त आँकड़ों को त्रिआयामी पुनर्संरचना के द्वारा एक कण को चित्रित किया। त्रिआयामी पुनर्संरचना में स्कैनिंग एवं इलेक्ट्रान टोमाग्राफी का उपयोग होता है।

उन्होंने बताया कि प्रोटीन संश्लेषण के दौरान प्रत्येक अमीनो एसिड के लिए डीकोडिंग एवं ट्रांसलोकेशन का एक चक्र होता है। प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में राइबोसोम की दोनों सबयूनिट रैकेट गति करती हैं।

व्याख्यान के अंत में नोबेल सम्मान विजेता प्रो• फ्रैंक ने यह भी बताया कि कैसे राइबोसोम की संरचना का उपयोग दवाओं के विकास में किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने तीन सुझाव दिए।

● पहला- जीवाणु जनित रोगों की रोकथाम में जीवाणुओं के राइबोसोम को लक्ष्य बनाकर।

● दूसरा- राइबोसोम की गलत कार्यप्रणाली से होने वाली बीमारियों में इसको सुधार कर।

● तीसरा- विभिन्न परजीवियों के राइबोसोम संरचना को लक्ष्य करके ये पता करना कि उनके और मनुष्य के राइबोसोम संरचना में क्या विभिन्नताएँ हैं ।

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