गुरू के प्रति कृतज्ञता जताने का महापर्व है गुूरू पूर्णिमा



--एकलव्य केसरी,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

जन्म के बाद से लेकर जिंदगी की अंतिम सांस तक अनेक गुरू जीवन में आते हैं। जीवन की शुरुआत घर की पाठशाला से होती है। यहाँ गुरू की भूमिका माता, पिता आसपास के लोग और वातावरण निभाता है। कुछ वर्षों बाद गुरू हमारे शिक्षक के रूप में लम्बे समय तक साथ निभाते हैं। वृद्धवस्था से पूर्व कई लोग आध्यात्मिक गुरू को तलाश लेते हैं। कहने का मतलब है कि गुरू की भूमिका और उनके मार्गदर्शन के बिना हमारा जीवन जडवत हो जायेगा। गुरू चेतना हैं, ज्ञान हैं जिनका समय समय पर साक्षात्कार होता रहता है। गुरू सास्वत हैं, साक्षात् हर समय उनकी उपस्थिति हमारे चारो ओर होती है, बस हम उस गुरू तत्व को देख नहीं पाते, ठीक उसी तरह जिस तरह हम ईश्वर को नहीं देख पाते हैं। गुरू गूढ हैं इसलिए उनका स्थान ईश्वर से भी ऊंचा बताया गया है।

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काको लागै पाय।
बलिहारी गुरू आपने जिन गोविंद दियो बताय।।

अर्थात, गुरू का स्थान इसलिए ईश्वर से ऊंचा बताया गया है क्योंकि उनके बिना हम ईश्वर के बारे में जान ही नहीं सकते हैं।

समय गुरू सबसे बड़ा : मनुष्य के जीवन में समय के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता। समय को सबसे बड़ा गुरू कहने की वजह भी है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु के बीच अच्छा और बुरा दोनों समय देखता है। बुरा वक़्त कोई भी याद रखना नहीं चाहता। इसका कारण है दुःख और अवसाद। यही समय हमें गुरू की अदृश्य शक्ति का आभास कराता है। चेतनाशील, ज्ञानी और तपस्वी लोग इसे महसूस करते हैं। सामान्य मनुष्य भी अपने जीवन की परेशानियों से अंततः निजात पा लेते हैं। वक़्त उन्हें एक गुरू की तरह समस्या से निकलने की राह दिखाता है। कुछ लोग दूसरों को जब उसी तरह की समस्या में घिरा देखते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से उससे बाहर निकलने में मदद करते हैं। ऐसा नहीं कि गुरू सिर्फ मनुष्य को ही शिक्षा देते हैं। गुरू तत्व तो सर्व व्यापी है। पशु, पक्षी, वनस्पति सब पर उनका प्रभाव दिखता है। प्रतिकूल समय में कुछ समय बिताने के बाद वे अनुकूलता की ओर अग्रसर होने लगते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जब किसी पौधे के रास्ते में कोई बाधा आ जाती है तो वे सतत बढ़ने के लिए दूसरी दिशा की ओर बढ़ने लगते हैं। वनस्पतियों और प्राणियों में समय के साथ होने वाले अनुकूलन या खुद को परिस्थिति के अनुसार ढालाने की प्रक्रिया के लिए अज्ञात निर्देश गुरू तत्व के बिना सम्भव नहीं है। पशु भी गुरू तत्व के कारण ही अपने अनुकूल भोजन की पहचान कर पाते हैं। गुरू तत्व के कारण ही नवजात, अबोध भी अपनी मां और दूसरी महिला में विभेध कर पाता है। ऐसे ही सर्वशक्तिमान गुरू के प्रति कृतज्ञता जताने का पावन दिन या यूं कहें महापर्व है गुरू पूर्णिमा।

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