लोक की थाती है "रमता" की कविताएं - हरिराम द्विवेदी



--- हरेन्द्र शुक्ला, वाराणसी।

•☆• बीएचयू भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में "स्मृति का आलोक" कार्यक्रम के तहत विचार गोष्ठी

वाराणसी : भोजपुरी देश की सांस्कृतिक धरोहर है। इसको सहेजे बिना सांस्कृतिक विकास की बात करना बेमानी होगी। यह बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की ओर से कार्यक्रम श्रृंखला ‘स्मृति का आलोक’ के अंतर्गत भोजपुरी के सुप्रसिद्ध कवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता जी’ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुये लोककवि पं• हरिराम द्विवेदी उर्फ झगड़ू भैया ने कही। उन्होने कहा कि आज रमता जी को न जानने की मुख्य वजह उनकी रचनाशीलता का छिपा होना है। रमता जी जैसे अनेक भोजपुरी के बड़े बड़े कवि आज भी अंधेरे में है हमारा दायित्व है कि ऐसे महत्वपूर्ण साहित्यकारों को ढूंढकर प्रकाशित करने व कराने की आवश्यकता है। रमता जी को भोजपुरी भाषा की थाती बताया। इस अवसर पर उन्होने केंद्र के समन्वयक से अपील करते हुये कहा कि भोजपुरी अध्ययन केंद्र भोजपुरी क्षेत्र के रचनाकारों का तीर्थ है। इसको गति देना अपनी संस्कृति को गति देने जैसे है।

मुख्यवक्ता प्रो• अवधेश प्रधान ने कहा कि अस्सी के दशक में किसानों की आंदोलन का नेतृत्व रमता जी ने किया था। रमाकांत जी आन्दोलनों से उभरकर ‘हेठार का कवि’ नाम से प्रसिद्धि पाई। 32 साल की उम्र से कविता लिखने वाले रमता जी जन आंदोलन के लिए कविता लिखते रहे और आगे चलकर विभिन्न विषयों और विचारों से प्रेरित होकर सामान्य जन की संवेदना को जागृति देने वाली रचनाओं से अपनी लेखनी को आगे बढ़ाये। मध्यवर्गीय चेतना का सामंजस्य उनकी कविताओं में देखा जा सकता है। प्रेम और क्रांति की प्रेरणा से प्रस्फुटित रचनाशीलता रमता जी का आज भी भावगम्य है। ‘धेवर के बैल’ नामक कविता के माध्यम से रमता जी की राजनैतिक चेतना को उभारकर देखा जा सकता है। नक्सलबाड़ी आंदोलन के माध्यम से रमता जी को परिवर्तन की एक आशा अपनी रचना और देश में दिखनी शुरू हुई। रमता जी एक साथ किसान, कवि और क्रान्तिकारी है; जिसमें उनका कलापक्ष अधिक प्रभावशाली है।

अतिथियों का स्वागत करते हुये भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि रमता जी जर्जर सामाजिक परंपराओं से संघर्ष करते हुए नई जिंदगी की चाहत के कवि थे जिन्होंने छद्म स्वराज का लगातार विरोध करते स्वस्थ स्वराज की बात कही। वे स्वार्थ प्रेरित सामूहिकता की जगह परार्थ प्रेरित सामूहिकता के पक्षधर कवि थे जहां संकल्प ही परिवर्तन में रूपांतरित हो जाता है। आगे इन्होंने कहा कि कई सांस्कृतिक मंचों से से उनके गीतों को आज भी गाया जाता है। ‘हामार सुनी’ संग्रह के माध्यम से रमता जी की विशिष्टता को जाना जा सकता है।

विशिष्ट वक्ता डा• बलभद्र ने कहा कि रमता जी से पहले मैं उनके गीतों को जानता था। आगे इन्होंने कहा कि जिन्होंने रमता जी को गाया उन्होंने भी उन्हें आजतक याद नहीं किया। लोगों ने उनके जनकवि रूप को न जानने का महत्वपूर्ण कारण है कि उनका कोई संग्रह उपलब्ध न होना, फुटकल गीतों को गाया जाता रहा और आज भी गाया जा रहा है। उनकी रचनाशीलता हिंदी व भोजपुरी दोनों में है और दोनों को मिलाकर भी रची गयी है लेकिन भाषा का प्रवाह भोजपुरी भाषा में सबसे सशक्त रूप से प्रवाहित है। रमता जी की कविता ब्रेख्त व नजीर के समान अपने भाव को प्रस्फुटित करती है। ‘हरवाहा बटोही संवाद’ कविता रमता जी की किसान चेतना को जागृत करने की अद्भुत ताकत वाली कविता है। नागार्जुन और रमता जी तमाम बड़े लोगों पर एक साथ कविता लिखते है लेकिन दोनों की संवेदना अलग-अलग रमती है। बड़ा कवि अपने ज़मीन से जुड़कर ज़मीन पर प्रकाश डालता है अंधकार को छांटता है साथ ही जन जागरूकता लाता है रमता जी का योगदान कुछ ऐसा ही है भोजपुरी भाषा में। भाषा का कोई विवाद रमता जी के यहाँ नहीं पाया जाता है।

भोजपुरी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर डा• प्रकाश उदय ने कहा कि रमता जी को आज़ादी के बाद के दिनों में विशेष रूप से याद रखने लायक है क्योकि आज़ादी के दिनों की याद में लिखी गयी उनकी कविताएं आज भी प्रासंगिक है। रमता जी की हिंदी व भोजपुरी की महत्वपूर्ण कविताएं चुप्पी को तोड़ने की बात करती है जिसमें शासन व सत्ता में जो भी आया जन सामान्य को अनसुना किया उनको भी जागृति देने वाली कविता है। रमता जी किसान है और कवि है वो किसी वाद में न फसकर बल्कि वो मूलतः चेतना के कवि है जनसामान्य के हकों को लड़ने वाले कवि है उनके सजग पहरुए जे रूप में सदैव डटे रहने वाले कवि है।

डी ए वी कालेज की डा• सुमन सिंह ने कहा कि भोजपुरी रमता जी के लिए सबसे सहज भाषा थी जिसमें उन्होंने तमाम गीत व कविता रची है जिसके माध्यम से जनसामान्य की समस्या को और उसके निराकरण को देखा जा सकता है।

डा• संतोष सहर ने कहा कि रमाकांत जी सत्तर के दशक में किसान आंदोलन से जुड़े वो राजनैतिक रूप से जन सामान्य के आवाज़ को उठाने वाले भोजपुरी के बड़े कवि है। उनकी चेतना सदैव ऊर्द्धगामी बनी रही। वो राजनैतिक चेतना के ही कवि नहीं है बल्कि रमता जी जन जागृति के कवि है, वो सदैव चलने वाले कवि है उनकी कविताओं के माध्यम से यह देखा जा सकता है कि उसमें बाढ़, आकाल, भुखमरी, क्रांति, प्रेम, प्रकृति इत्यादि सभी का समवेत वर्णन मिलता है। रमता जी को रागों की बहुत अच्छी समझ थी।

संचालन भोजपुरी अध्ययन केंद्र के शोध छात्र रूद्र प्रताप सिंह व धन्यवाद ज्ञापन प्रियंका सिंह ने दिया।

कुलगीत की प्रस्तुति सौम्या वर्मा, उत्कर्ष गुप्ता व मनोहर कृष्ण ने प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर प्रो• मदन लाल, प्रो• चंपा सिंह, प्रो• वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, डा• रामबक्श, डा• शिल्पा सिंह, विजय शंकर पांडेय, ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी, डा• अमर बहादुर सिंह, हिमांशु द्विवेदी सहित छात्र/छात्राएं भी मौजूद रहीं।

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