स्पेशल रिपोर्ट- प्रकाश पाण्डेय
• मुख्यमंत्री ने शहर के प्रमुख स्कूल ला मार्टिनियर का नाम लेते हुए कहा कि सबसे अधिक फीस इस स्कूल में लिए जाने की शिकायत मिली है। यहां वार्षिक फीस के रूप में दो लाख 47 हजार रुपए लिए जा रहे हैं।
• सेंट जेवियर्स स्कूल पर भी मनमानी फीस वसूलने का इलजाम लगाते हुए उन्होंने कहा कि आप लोगों के खिलाफ भी काफी शिकायतें हैं। पांच-पांच लाख रुपए आप लोग फीस के नाम पर ले रहे हैं, यह आखिर कैसी पढ़ाई है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
• एडमिशन फीस, ट्यूशन फीस, सेशन फीस, कंप्यूटर फीस, डेवलपमेंट फीस, स्पोर्ट्स व कल्चरल एक्टिविटी फीस के नाम पर इतने पैसे क्यों वसूले जाते हैं ?
• आखिर छात्रों को स्कूल से ही पुस्तक, ड्रेस, जूते, बैग लेने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है ?
• स्कूल बंद होने पर भी छात्रों से क्यों ट्रांसपोर्ट फीस व समर कैंप के नाम पर फीस वसूली जाती है ?
पहले निजी अस्पतालों के मनमाने बिलों पर नकेल कसने के बाद बंगाल राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निजी स्कूलों के खिलाफ सख्ती बरतते हुए डोनेशन-फी पर पर सवाल उठाए और उन्होंने कहा कि एक ही मद में बार-बार पैसे भला क्यों लिए जा रहे हैं ? इसे तत्काल रोकने की बात कहते हुए दीदी ने कहा कि यदि समय रहते इस प्रणाली में निजी स्कूलें खुद से विचार नहीं करती है तो उन्हें बाध्य होकर एक्शन में आना होगा। कोलकाता स्थित टॉउन हॉल में निजी शैक्षणिक संस्थानों के संचालकों के साथ बैठक के दौरान उन्होंने निजी स्कूलों के खिलाफ मनमाना डोनेशन लेने व एक ही मद में बार-बार पैसे लेने की शिकायत के बाबत सख्ती दिखाई। इस दौरान उन्होंने संचालकों से सवाल किया कि ऐसी शिकायतें क्यों आ रही है ?
मुख्यमंत्री ने महानगर के कम से कम कई संस्थानों के अधिकारियों पर सवालों की बौछार करते हुए उन्हें बेजुबान कर दिया। दीदी ने महानगर के एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान के अधिकारी से सवाल किया कि आप लोग सेशन फी व फी अलग-अलग क्यों लेते हैं ? एक अन्य संस्थान के अधिकारी से मुख्यमंत्री ने पूछा कि आप लोग बी० कॉम (ऑनर्स) के लिए 5-5 लाख रुपए तक की डोनेशन लेते हैं, इसे रोकना होगा। एक अन्य संस्थान के प्रतिनिधि पर नाराजगी जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आप दावा करते हैं कि हम डोनेशन नहीं लेते हैं पर आपके संस्थान में दाखिले के लिए डोनेशन का रैकेट चलता है। इसकी खबर है ? इसे आपको ही बंद करना होगा।
सेल्फ रेगुलेटरी कमिशन : मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल शिक्षा का हब है। हम चाहते हैं कि यहां की प्रतिभा और बढ़े। इसके लिए सरकार ने एक सेल्फ रेगुलेटरी कमिशन गठित करने का फैसला किया है। कमिशन में शिक्षा विभाग, पुलिस व महानगर के शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। कमिशन फी स्ट्रेक्चर की निगरानी करेगा। हर जिले से एक प्रतिनिधि कमिशन में होगा। शैक्षणिक संस्थानों को अपना वेबसाइट शुरू करने का परामर्श देते हुए उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से अभिभावक अपनी शिकायतें दर्ज कर सकेंगे।
पैसे से मेधा की बराबरी नहीं : शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधियों से मुख्यमंत्री ने कहा कि पैसे से मेधा की बराबरी नहीं की जा सकती है। कुछ स्कूल किताब व ड्रेस खरीदने के लिए छात्रों को बाध्य करते हैं। डोनेशन व फी के नाम पूरी तरह अंधेरगर्दी मची है। फी व सेशन फी पर सवाल दागते हुए ममता ने पूछा कि दोनों अलग-अलग क्यों लिए जाते हैं ? उन्होंने कहा कि हम किसी पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते, लेकिन बंगाल में रहने वालों को बंग्ला आना चाहिए। इसीलिए त्रिभाषा की प्रणली शुरू की है।
दीदी ने दावा किया कि बंगाल शिक्षा में सबसे आगे है, जिस पर उन्हें गर्व है। यहां 12,500 स्कूल हैं जिसमें लाखों की संख्या में विद्यार्थी पढ़ते हैं। वहीं निजी शैक्षणिक संस्थानों की डोनेशन व फी संबंधी मनमानी रोकने के लिए मुख्यमंत्री ने सेल्फ रेगुलेटरी कमिशन का गठन किया है। कमिशन में महानगर के नौ स्कूलों के प्रतिनिधि, राज्य के डीजीपी, कोलकाता के सीपी, महानगर के दोनों बिसप, दार्जिलिंग के बिसप के अलावा जिलों के शिक्षा प्रतिनिधि शामिल होंगे। कमिशन की हर चार महीने पर बैठक होगी जो सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
दीदी के इस पहल पर अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है और निजी स्कूलों की फी इतनी अधिक है कि एक से दो बच्चों को पढ़ाने में ही सारी कमाई लग जाती है। यदि राज्य की मुख्यमंत्री ने इस ओर ध्यान दिया है तो यह पहल सराहनीय है। एक अन्य अभिभावक ने कहा कि आज निजी स्कूलों में बच्चों को भेजना हमारी मजबूरी है क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का जो स्तर है वो 1990 के बाद से लगातार गिरता जा रहा है। इतना ही नहीं उन्होंने कई जमीनी सवाल भी उठाए जो सत प्रतिशत जायज थे। उनका कहना था कि एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक की तुलना में सरकारी स्कूल के शिक्षक की तनख्वाह कहीं ज्यादा होती है और डिग्री भी, बावजूद इसके वहां शिक्षा का स्तर न्यूनतम से भी गिरा क्यों है ?
हकीकत है कि सरकारी स्कूलों में सियासत ज्यादा पढ़ाई कम होती है। बच्चे राम भरोसे होते हैं। ऐसा नहीं है कि सारे बच्चे कमजोर ही होते हैं लेकिन ज्यादातर की स्थिति दयनीय होती है। दीदी की पहल तारीफ-ए-काबिल है लेकिन परिणाम आने बाकी हैं।
जब दीदी ने पूछे सवाल...
महानगर के टाउनहाल में हुई बैठक में ही मुख्यमंत्री ने संबंधित संस्थानों के प्रबंधनों से स्पष्टीकरण मांगा और सटीक जवाब नहीं मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि निजी स्कूलों-कॉलेजों को मोटी रकम डोनेशन लेना बंद करना चाहिए। मेधा को पैसा से नहीं आंका जाना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि जो मेधावी हैं उसके पास पैसा नहीं है और जिसके पास पैसा है उसके पास मेधा नहीं है।
• मुख्यमंत्री : ला मार्ट्स में सबसे ज्यादा 2 लाख 40 हजार फीस ली जाती है. प्रति वर्ष कितनी फीस यहां बढ़ायी जाती है ?
रेवरन ए अधिकारी, बोर्ड सदस्य, ला मार्टिनीयर फॉर ब्वायज ने कहा कि स्कूल में वन टाइम एडमिशन शुल्क के रूप में 2.47 लाख रुपए लिए जाते हैं। इस साल 11.9 प्रतिशत फीस में बढ़ोत्तरी की गई है। हमारा स्कूल एक बहुत बड़ी राशि निर्धन बच्चों की शिक्षा पर भी खर्च करता है।
• मुख्यमंत्री : सेंट जेवियर्स देश का नामी संस्थान है। यहां की शिक्षा भी एक्सीलेंट है, यहां किस तरह फीस ली जाती है ?
वाइस चांसलर, फादर फिलिक्स राज ने कहा कि हमारा संस्थान निजी संस्थान है। यहां देश की पीढ़ी तैयार होती है। हम सेवाएं दे रहे हैं, कोई बिजनेस सेंटर नहीं चला रहे हैं। फीस का पूरा ब्योरा पारदर्शी है व वेबसाइट पर दिया हुआ है। फिल्म स्टडीज व मास कम्युनिकेशन के लिए ढाई लाख रुपए फीस है। फीस के हिसाब से छात्रों के लिए बेहतरीन सुविधाएं भी हैं।
शिक्षायतन से शिकायत
शिक्षायतन स्कूल के प्रतिनिधि को मुख्यमंत्री ने कहा कि मैंने यहां से बीएड किया है, इसलिए मैं इसे अपना स्कूल समझती हूं। पर मुझे खबर मिली है कि स्कूल की प्रिंसिपल छात्राओं को एलसीडी स्क्रीन लगा कर एक राजनेता का भाषण सुनवाती हैं, जो सरासर गलत है। यह स्कूल है, इसे अपने राजनीतिक मकसद के इस्तेमाल में न लाएं। मुख्यमंत्री ने किसी राजनेता का नाम तो नहीं लिया, लेकिन स्कूल सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम को छात्राओं को सुनाए जाने को लेकर ही मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी आई है। वहीं मुख्यमंत्री द्वारा साल भर के फी के बारे में पूछे जाने पर स्कूल प्रशासन ने कहा कि 60,000 हजार रुपए पूरे साल के लिए जाते हैं।
• मुख्यमंत्री : मॉडर्न हाई स्कूल लड़कियों के लिए अच्छा स्कूल है। यहां कितनी फीस ली जाती है ?
प्रतिनिधि, मॉडर्न हाई स्कूल : नर्सरी के एडमिशन में एक बार ही 75,000 रुपए फीस ली जाती है। इसके बाद सालाना मात्र 45,000 रुपए लिए जाते हैं। यहां लड़कियो के लिए क्वालिटी एजुकेशन के साथ कई सुविधाएं उपलब्ध हैं।
• मुख्यमंत्री : हेरिटेज का फीस स्ट्रक्चर क्या है ?
सीमा सप्रू, प्रिंसिपल, हेरिटेज स्कूल ने जवाब दिया कि हमारे स्कूल में क्लास-1 के लिए सालाना कुल 1 लाख 10,000 रुपए फीस ली जाती है। इसकी पूरी जानकारी वेबसाइट पर भी दी गई है। सालाना 5 प्रतिशत फीस में बढ़ोत्तरी होती है। स्कूल में प्रत्येक छात्र से एडमिशन फीस केवल एक बार 90,000 रुपए ली जाती है। निजी संस्थान के रूप में बच्चों के लिए तीन मील, स्पोर्ट्स, एसी बस व तमाम कई सुविधाएं भी हैं। मुख्यमंत्री चाहती हैं कि हर बच्चे को राज्य में बेस्ट शिक्षा मिले, उनकी यह कोशिश व सोच सराहनीय है। इस बैठक से कुछ तो चीजें पोजेटिवली बदलेंगी।
• मुख्यमंत्री : साउथ प्वाइंट स्कूल में बच्चों से कितनी फीस ली जाती है ?
के० दम्मानी, ट्रस्टी, साउथ प्वाइंट हाई स्कूल ने कहा कि हमारे यहां प्रत्येक बच्चे से 3-4 हजार रुपए फीस ली जाती है। एक अभिभावक को अच्छी शिक्षा के लिए सालाना 40-48 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं। एडमिशन फीस भी मात्र 30,000 रुपए है।
शिक्षाविदों की राय
इस घोषणा के बाद महानगर के निजी स्कूलों में हड़कंप मचा हुआ है। हालांकि निजी स्कूल के कुछ प्रिंसिपल मुख्यमंत्री के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं।
अगर कोई निजी स्कूल एडमिशन के नाम से लाखों रुपए डोनेशन ले रहा है तो उस पर नियंत्रण होना ही चाहिए। ऐसे डोनेशन की लेनदेन से भ्रष्टाचार बढ़ता है। आज डिजिटल बोर्ड में अंगुली स्पर्श करने से ही चैप्टर बदल जाता है, बच्चे ह्यूमन डाइजेस्टिक सिस्टम देख सकते हैं। यह टेक्नोलॉजी शुरू करने में निजी स्कूल खर्च करते हैं, यहां सरकारी स्कूल जैसी फीस तो नहीं होगी। सरकार द्वारा निगरानी रखने का कदम सराहनीय है।
एस सी दुबे (शिक्षाविद व रेक्टर, ऑक्सफोर्ड हाई स्कूल)
कोलकाता में दिल्ली जैसी स्थिति नहीं है कि निजी स्कूल एडमिशन के नाम से लूट मचाएं। वहां काफी डोनेशन लिया जाता था, इसलिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। यहां सामान्य स्कूल में आधुनिक सुविधाओं के हिसाब से फीस ज्यादा ली जाती है, क्योंकि स्कूल चलाने व मेनटेन करने के लिए काफी खर्च होती है। इसके बदले में यहां बच्चों का जीवन भी संवरता है। अगर सरकार ने निजी स्कूलों के साथ बातचीत करने, अपना पक्ष व प्रस्ताव रखने की रणनीति तय की है तो यह अच्छी बात है, इससे शिक्षा में कुछ सकारात्मक बदलाव आयेगा।
मुक्ता नैन (प्रिंसिपल, बिरला हाई स्कूल)
एडमिशन के नाम से बहुत ज्यादा डोनेशन लेने वाले निजी स्कूलों पर नियंत्रण व निगरानी होनी चाहिए। सरकार की यह घोषणा एक सही कदम है, लेकिन इसका प्रभाव विपरीत नहीं होना चाहिए। हमारा स्कूल आज केजी से लेकर 12वीं कक्षा तक जो सुविधाएं बच्चों को देता है, उसकी तुलना में हमारी फीस अन्य स्कूलों के मुकाबले बहुत नोमिनल है। क्वालिटी एजुकेशन के लिए स्कूल को कई खर्चे करने पड़ते हैं। अगर फीस नहीं लेंगे तो स्कूल नहीं चलाया जा सकता है। आज सरकारी स्कूलों में सरकार कई तरह के लाभ बच्चों को दे रही है, फिर भी अभिभावक निजी स्कूलों की तरफ दौड़ते हैं, क्योंकि क्वालिटी एजुकेशन चाहिए। यह भी समझना होगा। इसी के आधार पर सरकार को स्कूल प्रबंधकों से विचार-विमर्श करना चाहिए।
विजया चौधरी (प्रिंसिपल, बीडीएम इंटरनेशनल स्कूल)
• अब भी सक्रिय हैं एडमिशन माफिया
महानगर व इसके आसपास के बड़े स्कूलों में मेरिट के जरिए यदि आपके बच्चे का एडमिशन नहीं हो पा रहा है तो शहर में ऐसे कई दलाल अब भी सक्रिय हैं जो रुपए लेकर आपके बच्चों को उन स्कूलों में एडमिशन दिला सकते हैं जहां पर अपने बच्चे को एडमिशन दिला पाना आपके लिए नामुमकिन था। पिछले साल (2016 में) मंजू राठी नाम की एक महिला को कोलकाता के शेक्सपियर सरणी पुलिस ने एडमिशन धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया था। आरोपी ने पुलिस को बताया था कि वो अपने सम्पर्कों के जरिए 10 शहरों के स्कूलों और कॉलेजों में हर साल कम से कम 150 छात्रों का एडमिशन करवाती थी। पूछताछ के दौरान राठी ने शहर के कई बड़े स्कूलों के संचालकों के साथ खुद के सम्पर्क की बात भी कुबूल की थी और उसने बड़े आत्मविश्वा स के साथ कहा था कि उसके लिए इन स्कूलों में एडमिशन करवाना कोई खास बड़ी बात नहीं थी। मंजू इस काम में पिछले 12 साल से लगी थी। एक-एक एडमिशन के बदले में वो लाखों रुपए लिया करती थी। इतना ही नहीं राठी ने मध्य कोलकाता के एक नामचीन स्कूल के प्रधानाध्यक का भी नाम पुलिस को बताया है उसने कहा कि उनकी मदद से ही एडमिशन सम्भव हो पाता था। पुलिस ने राठी के इस बयान को रिकॉर्ड कर रखा है। खैर, मंजू तो पकड़ी गई और उसका आरोप भी साबित हो गया। लेकिन इसकी क्या गारेंटी है कि मंजू जैसे दूसरे लोग इस काम में सक्रिय नहीं है। आज भी एडमिशन माफियाओं का एक बड़ा रैकेट महानगर व इसके आसपास के जिलों में सक्रिय है और उनका काम जोर पर है। इस बात की पुष्टि खुद राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निजी स्कूलों के संचालकों के साथ की एक बैठक के दौरान की।
• निजी स्कूलों की गैरवाज़िब फीस से केंद्र भी खफा, सख्ती के निर्देश
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंह मांगी रकम वसूल रहे निजी स्कूलों को चेतावनी देते हुए कहा है कि निजी स्कूल गैरवाज़िब फीस और अन्य बेफिजूल के चार्ज नहीं वसूल सकते। इससे अभिभावकों को तकलीफ होती है। सीबीएससी ने इस बारे में तमाम स्कूलों से उनके फीस स्ट्रक्चर का डाटा तलब किया है। वहीं सरकार इस बाबत सख्त कदम उठाने के फिराक में भी है।
जावड़ेकर ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि हमने सभी स्कूलों से उनके फीस स्ट्रक्चर और बढ़ाई गई फीस की जानकारी मांगी है। कुछ स्कूलों ने इसकी जानकारी भेजी है और फिलहाल इसकी जांच की जा रही है। जिन स्कूलों ने डाटा सबमिट नहीं किया है, उनको पहले रिमाइंडर भेजा जाएगा और फिर भी जवाब नहीं मिला तो जुर्माना लगाया जाएगा। हालांकि, जावड़ेकर ने जुर्माना कितना और किस आधार पर लगाया जाएगा, इसकी जानकारी नहीं दी।
जावड़ेकर ने कहा कि 250 रुपए से लेकर ढाई लाख रुपए तक की सालाना फीस वसूली जाती है। इसका फैसला अभिभावक को करना होता है। निजी इन्वेस्टमेंट्स जीडीपी में मदद जरूर करते हैं लेकिन स्कूलों को ओवर चार्जिंग से बचना चाहिए।
• स्कूल दुकान न बने
बता दें कि कुछ दिन पहले सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन ने प्राइवेट स्कूलों को चेतावनी दी थी और कहा गया था कि कुछ निजी स्कूल मनमानी फीस और गैरवाज़िब चार्जेस वसूल रहे हैं।
सीबीएससी ने ये भी कहा था कि ये स्कूल अभिभावकों को स्कूल से ही किताब और ड्रेस खरीदने के लिए कहते हैं। इस तरह की दुकानें स्कूल परिसर के अंदर खोली गई हैं।
• हाशिए पर सरकारी स्कूल!
सरकारी स्कूलों में अभिभावक अपने बच्चों को भेजने से कतराते हैं वजह यह कि उन्हें यह लगता है कि वहां उनके बच्चे को सही शिक्षा नहीं मिलेगी और उनका बच्चा उपेक्षित होगा। अगर आर्थिक सामर्थता है तो वह अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाना पसंद करते हैं। हालांकि पहले इस तरह की धारणाएं नहीं थी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का यह नजरिया निराधार है, या इसके पीछे कुछ तथ्य भी हैं?
गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्त के लिए जो मापदंड तैयार किए गए हैं वो उच्च स्तरीय है। इन स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति उनकी शैक्षणिक योग्यता पर निर्भर होती है। बावजूद इसके यहां तालिम के नाम पर कुछ खास नहीं होता, यहां प्राइवेट स्कूलों की तुलना में सुविधाएं भी बहुत ज्यादा दी जाती है। जैसे की शिक्षक का वेतन, जो प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की तुलना में कहीं ज्यादा होता है, किताबें भी मुफ्त में ही दी जाती है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में ऐसा नहीं है। प्राइवेट स्कूलों में तो आपको किताबों से लेकर स्कूली यूनिफार्म तक उन्हीं से खरीदना पड़ता है और ये स्कूलें इसके एवज में मुंह मांगा दाम भी वसूलती है और अभिभावक खुशी-खुशी देने को तैयार रहते हैं इसके पीछे वजह यह है कि अभिभावकों को ऐसा लगता है कि यहां उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा हासिल होगी। सरकार ने मीड-डे मील योजना को इस लिए चालू किया कि स्कूल में ज्यादा से ज्यादा बच्चे उपस्थित हो, यूपीए शासनकाल में कांग्रेस नीत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया। जिसमें यह कहा गया कि 6 से 14 साल की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी और इसे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया। खैर बच्चे देश का भविष्य होते हैं। उन्हीं पर भविष्य में देश की उन्नति निर्भर होती है। उन्हें पूर्ण रूप से शिक्षित करना पालकों का ही नहीं देश की सरकार का भी कर्तव्य है और इसके लिए सरकार कई कार्यक्रम और योजनाएं बनाते रही है और ऐसी ही एक योजना है अनिवार्य शिक्षा का अधिकार। सुप्रीम कोर्ट ने भी शिक्षा का अधिकार कानून पर अपनी मुहर लगाते हुए पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। इस अधिनियम के पारित होने से देश के हर बच्चे को शिक्षा पाने का सवैंधानिक अधिकार मिला। इस कानून के तहत देश के हर 6 साल से 14 साल के बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला। हर बच्चा पहली से आठवीं तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से इस अधिकार के तहत पढ़ाई कर सकता है। सभी बच्चों को अपने आस-पास के स्कूल में दाखिला लेने का अधिकार हासिल हुआ।
सबसे बड़ी बात यह है कि यह कानून निजी स्कूलों पर भी लागू किया गया। शिक्षा के अधिकार के तहत राज्य सरकारों को यह सुनिश्चिित करने को कहा गया कि उनके राज्य में बच्चों को नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा प्राप्त हो। बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ स्कूलों में अन्य अनिवार्य सुविधाएं जैसे पेय जल की सुविधा, खेलकूद की सामग्री, खेल का मैदान भी मुहैया कराने के बाबत राज्य की सरकारों को कहा गया। इस अधिनियम के पारित होने के बाद शुरुआती रुझान अच्छे दिखे, जो पालक अपने बच्चों को बड़े निजी स्कूलों में पढ़ाने में असमर्थ हैं या थे, उन्हें इस अधिनियम का लाभ मिला। अच्छे स्कूलों में उनके बच्चे शिक्षा पाने लगे। इस बात पर बहस आज भी जारी है कि कुछ निजी संस्थान इस अधिनियम के विरोध में भी हैं। यह भी चर्चा का विषय है कि इस अधिकार के तहत बच्चों को भी प्रवेश तो मिल गया, लेकिन जो अन्य स्कूली खर्च हैं। उन्हें कैसे वहन किया जाए। खैर जो भी हो यह अधिनियम शिक्षा की दिशा में एक मिल का पत्थर साबित हुआ।
कई राज्यों की ग्रामीण अंचलों के स्कूलों के शिक्षकों से गम्भीर समाचार की टीम ने बात की, बातचीत के दौरान वहां के शिक्षक ने कहा कि स्कूलों में बच्चों की कमी की है। कई जगह ऐसा भी सुनने को मिला कि आस पास कोई भी बच्चा आउट ऑफ स्कूल नहीं है। फिर भी सरकारी स्कूलों में बच्चों की कमी है तो यह गंभीर चिंता का विषय है कि आखिर सरकारी स्कूलों के बच्चे कहां जा रहे हैं? सरकारी स्कूलों के शिक्षक स्वयं बताते हैं कि वे बच्चे आसपास के उन प्राइवेट स्कूलों में जा रहे हैं जहां तुलनात्मक रूप से कम वेतन पाने वाले, कम शिक्षित और कम प्रशिक्षित शिक्षक हैं। आखिर क्या वजह है इन बच्चों के सरकारी स्कूलों से विमुख होने की, जबकि सरकार की तमाम कोशिशें बच्चों को इन स्कूलों से जोड़ने की ही हैं? यह बात स्कूली शिक्षा के कई पहलुओं से जुड़ती है, क्योंकि गिरता नामांकन समस्या का लक्षण मात्र है, समस्या की जड़ मेंं कुछ और ही है। सोचिए तो स्कूलों का प्रमुख हितधारक कौन है? बच्चों के अभिभावक ही न। उन अभिभावकों का नजरिया सरकारी स्कूलों के लिए कैसा है? ऐसी जगह जहां कुछ विशेष नहीं हो रहा है, जहां उसे संसाधनों की कमी नजर आती है। यह बात अलग है कि संसाधन एक अच्छे विद्यालय होने को निर्धारित नहीं करते और इसके कई उदाहरण हमारे पास हैं जहां संसाधन के नाम पर तामझाम नहीं हैं लेकिन शिक्षा अच्छी रही है। सरकारी स्कूल में अपने बच्चे को भेजने से अभिभावक को लगता है कि वह अपने बच्चे को एक उपेक्षित जगह पर भेज रहा है। अगर सामर्थ हो तो वह अपने बच्चे को कहीं और पढ़ाता। इसी में दूसरी बात यह भी है कि सरकारी विद्यालय वह चकाचौंध नहीं दे पाते जो कि एक प्राइवेट स्कूल देता है। यह चकाचौंध कई प्रकार से है, चाहे वह भौतिक संसाधनों के रूप में हो या अंग्रेजी माध्यम के छलावे के रूप में। क्या सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का यह नजरिया निराधार है या इसके पीछे कुछ गहरे तथ्य भी हैं?
नब्बे के दशक से पहले इस तरह की धारणाएं नहीं थीं और ऐसा भी नहीं था कि हमारे सरकारी विद्यालय तब पूरी तरह संसाधन-संपन्न थे। उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि हमारे सरकारी स्कूल हाशिए पर चले गए। एक बात समझ में आती है कि नब्बे के दशक के बाद वैश्वी करण का दौर आया। सब कुछ बाजार से प्रभावित होता दिखा। कहीं यही तो समस्या की जड़ नहीं है कि हमारे सरकारी स्कूल बदले परिदृश्य मे खुद को नहीं बदल पाए और हाशिए पर चले गए? यह बड़ा सवाल है, इस पर ठहर कर सोचना होगा कि क्या स्कूली शिक्षा पर बाजार का प्रभाव पड़ने देना चाहिए या शिक्षा के इससे कहीं व्यापक उद्देश्य हैं। आज का अभिभावक चाहता है कि उसके बच्चे को ऐसी शिक्षा मिले जिससे उसका सामाजिक और आर्थिक स्थान ऊंचा हो। वह पाता है कि प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चे को दाखिला दिला कर वह एक कदम आगे बढ़ जाता है। यह है प्राइवेट स्कूल का बाजारवादी अंदाज और आज के विकास मॉडल के लिए दिख रही उसकी सार्थकता। अब बाजार वाले सवाल से जोड़ें तो देखेंगे कि प्राइवेट स्कूल बाजार से पूरी तरह प्रभावित हैं। उनके लिए उपभोक्ता की संतुष्टि बहुत महत्त्वपूर्ण है, लिहाजा शिक्षा ऐसी हो जिससे निकल कर उसके छात्र इस बाजार में फिट हो सकें। शिक्षा के मूल उदद्ेश्य आम अभिभावक की समझ से परे हैं, उसे तो वही शिक्षा मूल्यवान दिखती है जिसके नतीजे उसे तत्काल दिख जाएं।
अगर सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर चलाने का प्रयत्न करेंगे तो कुछ घालमेल कर रहे होंगे। अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूल बनाने की कवायद इसी नकल की प्रवृत्ति का उदाहरण है, क्योंकि यह बड़ा शिक्षाशास्त्रीय सवाल है कि बच्चे की शिक्षा कैसी हो? क्या प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर सरकारी स्कूल चला कर और अभिभावक को छलावा देकर या उसकी अपेक्षा के अनुरूप शिक्षा देने की मुहिम एक समझदारी भरा रास्ता है? यह नामांकन को प्रभावित करेगा, लेकिन क्या एक देश की सरकारी शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने का यही विकल्प है, यह एक सवाल है।
अच्छी शिक्षा को अभिभावक कैसे देखते हैं, और बदली परिस्थितियों में अभिभावक संसाधनों को कैसे देख रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों में एक फार्मूला तो स्पष्ट है कि हर कक्षा के लिए कम से कम एक अध्यापक नियत है, जबकि सरकारी स्कूलों में बहुकक्षीय प्रणाली चल रही है। यह बात अलग है कि बहुकक्षीय प्रणाली को सेवापूर्व और सेवारत शिक्षक प्रशिक्षणों में कितना स्थान दिया गया है। लेकिन बड़ी बात यह है कि क्या प्रत्येक कक्षा के लिए कम से कम एक अध्यापक होना समाधान है? अगर यह एक समाधान है तो ऐसे सरकारी स्कूलों में नामांकन की समस्या न होती जहां प्रर्याप्त संख्या में अध्यापक हैं। समस्या कहीं और है और इसका समाधान भी इतना आसान नहीं है। यह भी विचार करना होगा कि आज से तीन दशक पहले जब सरकारी विद्यालय पल्लवित थे, तो क्या हर कक्षा में एक अध्यापक नियत था? सरकारी शिक्षा व्यवस्था का अपना एक तंत्र होता है जिसमें अध्यापक सबसे निचले पायदान पर है। गिरते नामांकन की सभी लानतें अध्यापक पर भेजी जा रही हैं। विचार करना होगा कि ये अध्यापक कौन हैं? क्या यह विचारहीन और कर्तव्य से विमुख लोगों की फौज है, या ये भी आम नागरिक हैं जिन्हें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का बोध है। दरअसल, हर अध्यापक अपने-अपने स्कूल में संघर्ष कर रहा है लेकिन उसे हमने पेशेवर के रूप में तैयार नहीं किया। हमने गुरु नाम देकर उसे ऊंचा स्थान तो दे दिया लेकिन यह भूल गए कि गुरु के पास अपना स्वयं का पाठ्यक्रम होता है। क्या हमने आज के शिक्षक को इतना सबल बनाया है कि वह अपना पाठ्यक्रम स्वयं बना सके? एक सिस्टम में हम शायद यह न कर पाएं लेकिन शिक्षक को एक पेशेवर के रूप में तो तैयार कर ही सकते थे जो कि आज की शिक्षा की चुनौतियों का सामना कर सके। सेवा पूर्व प्रशिक्षणों की अवधि बढ़ाने की कवायद इस ओर ध्यान देती दिखती है। लेकिन मात्र समयावधि बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। सच बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय चलन के चलते शिक्षा के सार्वभौमीकरण की राह पर हम चल पड़े हैं, क्योंकि अगर इसमें राजनीतिक इच्छा शक्ति होती तो कोठारी आयोग की महत्त्वपूर्ण सिफारिशें ठंडे बस्ते में न होती। उन सिफारिशों में दो मुख्य सिफारिशें थी। शिक्षा बजट को जीडीपी के छह प्रतिशत तक करना और समान स्कूल प्रणाली की पुरजोर वकालत। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से हम बंटे हुए समाज के रूप में रहे हैं और वर्तमान शिक्षा प्रणाली इसे और पुख्ता कर रही है। साफतौर पर दो वर्ग बनते हुए दिखते हैं। एक, जिसे प्राइवेट स्कूल तैयार कर रहे हैं और एक वह वर्ग जो सरकारी स्कूलों में है। तकनीकी रूप से कोई भी संस्था महज लाभ के लिए प्राइवेट स्कूल नहीं चला सकती। वह या तो एक सोसाइटी के रूप में पंजीकृत होनी चाहिए या एक ट्रस्ट के रूप में। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा है कि प्राइवेट स्कूल लाभ न कमा रहे हों। इन स्कूलों की एफिलिएशन सरकार द्वारा ही की जाती है और सारा सिस्टम धृतराष्ट्र की तरह सब कुछ होने दे रहा है। इन लाभ कमाने वाली संस्थाओं पर कोई लगाम नहीं है और सरकारी स्कूली व्यवस्था की रीढ़ तोड़ने में ये संस्थाएं कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। इसके साथ ही प्राइवेट स्कूल व्यवस्था में शिक्षकों के शोेषण पर कोई लगाम नहीं है। कोठारी आयोग ने वेतनमान समानीकरण की भी वकालत की थी, लेकिन यह सर्वविदित है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के वेतन में कितना अंतर है। यह एक संक्रमण काल सा दिखता है, लेकिन आश्चसर्य इस बात का है कि सरकारी स्कूलों के गिरते नामांकन और प्राइवेट स्कूलों के फैलाव के प्रति हम अब भी उदासीन हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि सरकारी स्कूलों में नामांकन मात्र पैंसठ प्रतिशत के लगभग रह गया है, जो कि विकसित देशों के विपरीत काफी कम है। किसी भी विकसित देश को देखें तो पाएंगे कि यह संख्या कहीं भी नब्बे प्रतिशत से कम नहीं है। हम करना क्या चाहते हैं? यदि हम वर्तमान स्थिति को नियंत्रण में लाना चाहते हैं तो हमें प्रयास करना होगा कि सरकारी स्कूली व्यवस्था को सुदृढ़ करें। इसे सुदृढ़ करने के लिए समय-समय पर बने विभिन्न आयोगों की सिफारिशों पर नए सिरे से विचार करें।
लगभग सभी आयोगों ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए महत्त्वपूर्ण सिफारिशें दी हैं। कोठारी आयोग के सुझावों पर विस्तृत चर्चा की जानी चाहिए, जिनमें साफ तौर पर शिक्षा बजट को जीडीपी के छह प्रतिशत तक करने और समान स्कूल प्रणाली की वकालत की गई है। तात्कालिक रूप से समाधान के लिए राज्यों को कमर कसनी होगी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की मजबूती और प्राइवेट स्कूल के नियमन के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे।
• क्या है शिक्षा का अधिकार
एक योजना है अनिवार्य शिक्षा जिसे क्रियांवित करने के लिए पूर्व की संप्रग सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया। 6 से 14 साल की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के उद्देश्य से 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया गया। इसे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी शिक्षा का अधिकार कानून पर अपनी मुहर लगाते हुए पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। इस अधिनियम के पारित होने से देश के हर बच्चे को शिक्षा पाने का सवैंधानिक अधिकार मिला।
• सुधार पर तकरार
शिक्षा के स्तर में सुधार, प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस और मनमानियों पर नकेल कसने के लिए कई राज्यों ने योजनाएं भी तैयार की, सबसे पहले दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने शिक्षा सुधार संबंधी तीन विधेयक पारित किए, लेकिन विधेयकों में शामिल प्रावधानों पर बवाल हुआ। विरोध में अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सड़क पर उतर आए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन इन विधेयकों में किए गए प्रावधानों को शिक्षा विरोधी और प्राइवेट स्कूलों की मनमानियों को बढ़ावा देने वाला करार दिए। उनका मानना था कि राज्य सरकार दिल्ली विद्यालय विधेयक और दिल्ली विद्यालय शिक्षा संशोधन विधेयक की आड़ में दिल्लीवासियों के साथ साजिश कर रही है। आम जनता को प्राइवेट स्कूलों पर लगाम कसने का सब्जबाग दिखा कर वह इन दोनों विधेयकों के माध्यम से प्राइवेट स्कूलों को यह कानूनी अधिकार देने जा रही है कि वह शिक्षा को व्यवसाय बनाकर जो अब तक करते आए थे, उसे जारी रख सकते हैं।
शिक्षा क्या है ? ये सवाल शिक्षा के बारे में हैं, मन के बारे में हैं, जीवन के बारे में हैं, और ये सब एक दूसरे से जुड़े हैं। गंगा बस उतनी नहीं है, जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहां से उद्गम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दिख रहा है, वही गंगा है, यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीजें शामिल हैं, और हमारी इजादें सूझें, हमारे अंदाजे विश्वाीस, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब के सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जांच-परख करनी होगी। शिक्षा क्या है और इसमें क्या-क्या शामिल है। केवल परीक्षा पास करना ही नहीं बल्कि शिक्षित होने का पूरा तात्पर्य क्या है। चूंकि हम इन सब चीजों के बारे में प्रतिदिन वार्ता करते हैं और आखिर में जो कुछ भी सब ढाक के तीन पात वाली स्थिति होती है। स्कूली बच्चों से मेरी गुजारिश है कि वो कृपया अपने अध्यापकों से कहें कि वे आपको इत्मीनान से ये बातें समझाएं। इन बातों का संबंध मुख्य रूप से छात्रों से लिया जाता है, और आखिर में अभिभावक शिक्षकों से सवाल करें। ऐसा करने से छात्रों को अपनी समस्याओं के स्पष्टीकरण में सहायता मिलेगी।
• कृष्ण सुदामा एक साथ नहीं पढ़ सकते
वहीं अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकारी कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाए। तभी वे इन स्कूलों की खस्ता हालत को समझ सकेंगे। यही नहीं कोर्ट ने कहा था कि यदि उनके बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ेंगे तो वे बच्चों की पढ़ाई पर होने वाले इस खर्च के बराबर राशि सरकारी खजाने में जमा कराएं। कोर्ट ने सूबे के मुख्य सचिव को छह महीने में इस पर अमल सुनिश्चि त करने के आदेश भी दिए थे। कोर्ट ने कहा यह भी कहा था कि सभी जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों जिनमें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर आईएएस-आईपीएस तक शामिल होंगे और वे सभी कर्मचारी जो सरकार से सैलरी लेर हे हैं उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाए जाएं। हालांकि इसका पूर जोर विरोध भी हुआ था और कोर्ट के आदेश के खिलाफ सभी एकजुट भी हुए थे, यानि की कृष्ण सुदामा एक साथ नहीं पढ़ सकते हैं।
चलिए जिला क्रम के अनुसार आपको बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में कितनी सरकारी स्कूलें किस जिले में हैं।
बांकुरा - 3452
वर्धमान - 4000
बीरभूम - 2315
कूचबिहार जिला - 1806
दक्षिण दिनाजपुर - 989
दार्जिलिंग - 328
हुगली - 2985
हावड़ा - 2034
जलपाईगुड़ी - 2036
कोलकाता - 1392
मालदह - 1884
पूर्व मेदिनीपुर - 3108
पश्चि म मेदिनीपुर - 4671
मुर्शिदाबाद - 3147
दक्षिण 24 परगना - 3559
नादिया - 2474
पुरूलिया - 2904
उत्तर 24 परगना - 3329
उत्तर दिनाजपुर - 1509
यानि कि पश्चिम बंगाल में कुल 47922 सरकारी स्कूलें है।