अटल सिद्धान्त के पत्रकार व साहित्यकार थे अज्ञेय



रिपोर्ट- प्रकाश पाण्डेय

अंत: सम्पप्रेषण या अंत: अभिव्यक्ति के कई तरीके है। दो व्यक्ति के बीच जब संवाद अंत: से अन्तर के स्तर पर आता है तो वह विचार भाव आत्म अवलोकन के जरिए प्रबल साहित्य सृजन के रूप में उभरता है और इस प्रबल सृजन में आकार गठन का कार्य वे करते हैं जो साहित्य और समाज के मध्य संबंध की विवेचना कर संवाद स्थापना के लिए उस वर्ग तक चीजें पहुंचाते हैं जहां उसकी खासा ज़रूरत होती है। किसी भी साहित्य की पूर्णता में पत्रकारिता व पत्रकार की आड़ होती है।

पत्रकार के संदर्भ में कहा जाता है कि जेक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ नन यानि उसके पास किसी एक विधा में मास्टरी न होने के बावजूद भी वो हर मर्ज की दवा लिए उपचार करता चलता है। लेकिन ये सारी बातें उस शख्स के लिए विलोम रही, क्योंकि वो हर विधा का महा पंडित था- नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय। वात्स्यायन के नाम से पहचान बनी लेकिन लाहौर में कैद के दिनों में साथी जैनेन्द्र कुमार द्वारा एक उपनाम अज्ञेय दिया गया। इस अज्ञेय उपनाम से वात्स्यायन जी की रचनाएं प्रकाशित होती रही, जिसे वो जैनेन्द्र जी के पास छपने के लिए भेजा करते थे। उनके जीवन की विस्तृत और वैविध्यपूर्ण अनुभव उनकी रचनाओं में यथार्थवादी स्वरुप में सामने आती है। कविता हों, कहानियां हो, उपन्यास हो, या फिर उनकी पत्रकारिता हो, सभी विधा में उनके जीवन के विभिन्न कालों की संवेदना अभिव्यक्त हुई है।

एक हिन्दी और अंग्रेजी के लेखक के जीवन यापन और उपार्जन की तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह सामने आता है कि अंग्रेजी वाले लेखक की आमदनी हिन्दी वाले लेखक से कई गुना ज्यादा है। अंग्रेजी वाले का सामाजिक रुतबा भी हिन्दी वाले की तुलना में काफी बेहतर होता है। वह ब्रेड और बटर क्लास का होता है और हिन्दी वाला आम तौर पर दीन-हीन, उदास-बेजार दाल-भात वाला। लेकिन हिन्दी के कौशलताज वात्स्यायन जी के लिए दीन-हीन, उदास-बेजार जैसी स्थितियां हमेशा से ही दूर रहीं। उनकी विचार शक्ति और उनका चेहरा एक तरह की कुलीनता को बयां करता था। वे कभी दुख से न घिरे। दुख आया भी होगा तो वो उनकी आभा को मांजकर प्रखर करने का ही काम किया होगा। अज्ञेय खुद लिखते हैं, दुख सबको मांजता है...

उनकी कालजयी उपन्यास शेखर: एक जीवनी में शेखर की भूमिका में लिखते हैं कि यह जेल के स्थगित जीवन में केवल एक रात में महसूस की गई घनीभूत वेदना का ही शब्दबद्ध विस्तार है। इतना ही नहीं उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि शेखर के जीवन की कुछ घटनाएं और स्थान उनके जीवन से मिलते-जुलते हैं लेकिन जैसे-जैसे शेखर का विकास होता गया है वैसे-वैसे शेखर का व्यक्ति और रचने वाला रचनाकार एक-दूसरे से अलग होते गए हैं।

अज्ञेय का शेखर जन्मजात विद्रोही होता है। वो परिवार, समाज, व्यवस्था और मर्यादा के खिलाफ आवाज उठाता है। वो आजादी का आग्रही है और उसके अनुसार हर व्यक्ति की आजादी उस व्यक्ति के विकास के लिए बेहद जरूरी होता है। यथार्थवादी साहित्य में किसी भी पात्र का जन्म अकस्मात नहीं होता, किसी भी यथार्थवादी रचना में घटनाओं और पात्रों का जन्म हकीकत के आइने को पेश करता है और उस रचना के केंद्र में देस-काल-परिस्थितियां होती हैं। शेखर में व्यक्ति आजादी की अनुभूति और अभिव्यक्ति की छटपटाहट नजर आती है। अज्ञेय का शेखर हमेशा अपने अंतर्मन की सुनता है और खुद के विवेकानुसार काम करता है। वो स्कूली शिक्षा का विरोध करता है क्योंकि उसके अनुसार स्कूलों में टाइप बनते हैं और वो व्यक्ति बनना चाहता है। एक ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से ईमानदारी हो, उसके जीवन में सुख-दुख का खुलापन हो। वह पिता की इच्छा का अनादर करता है, क्योंकि पिता अंग्रेजी की वकालत करते हैं और वो हिंदी में लेखन करना चाहता है। अंग्रेजी में उसे दासता की बूं आती है। शेखर की निहायत ईमानदार होने की वजह से वो जिज्ञासु होता है। जिंदगी के हालातों को लेकर उसके मन में सवाल उठते हैं और वह उन हालातों को अनुभव करता चलता है, उनसे सीखना चलता है। भले ही अज्ञेय मनोवैज्ञानिक दृष्टि रहते हुए व्यक्ति विकास की कहानी बुने हो, लेकिन उनके खुद की जिंदगी की दास्तां से ये उपन्यास मेल खाती है। ये उपन्यास व्यक्ति की आजादी और बंधन मुक्त मार्मिक यथार्थ की धरातल को छूते हुए सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का काम करती है।

अज्ञेय यानि रफ्तार लेकिन वात्स्यायन जी के इस अज्ञेय उपनाम में साहित्य सृजन और कर्म के साथ ही रहस्यमयता भी आखिरी क्षण तक बनी रही। कई लेखकों ने उन्हें वाम विचारक तो कई ने पूंजीवादी करार दिया। लेकिन असल में वो किस विचार के थे आज तक इस पर एक विचार कायम नहीं हो सका है। आगाजी दौर में क्रांतिकारी स्वभाव देखने को मिलता है तो वहीं शेखर तक पहुंचते-पहुंचते उनका किरदार भले ही लेखन के जरिए ही सही व्यवस्था परिवर्तनकर्ता के तौर पर उभरता है। अंग्रेजी सेना में जब भर्ती होने के दौरान उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

हिन्दी साहित्य के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता में भी अज्ञेय का योगदान अज्ञेय ही रहा। मप्रतीकफ, मदिनमानफ, मएवरीमैंसफ या मनवभारत टाइम्सफ में उनके निकट सहयोगी रहे अनेक पत्रकार व सह-संपादक बाद में बड़े संपादक बने। साल 1946 में सेना से लौटने के बाद, पहले इलाहाबाद से फिर दिल्ली से मप्रतीकफ का प्रकाशन शुरू किया गया। उसमें सहयोगी के रूप में रघुवीर सहाय भी जुड़े थे जो बाद में मदिनमानफ में भी पहले सहयोगी और बाद में उसके संपादक बने थे। हालांकि मप्रतीकफ साहित्यिक पत्रिका थी। प्रतीक के प्रकाशन में अज्ञेय के ऊपर कितना आर्थिक बोझ पड़ा था, इसको उनके अनन्य मित्र और सहयोगी पंडित विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है कि मप्रतीकफ में अज्ञेय ने अपना सबकुछ लगाया और उसमें इतनी आर्थिक हानि सही कि उस हानि को पूरा करने के लिए उन्हें 1963 तक कठोर परिश्रम करना पड़ा।

प्रतीक बंद होने के बाद रघुवीर सहाय ने लिखा कि मप्रतीकफ बंद होने के बाद हठात यह मालूम हुआ कि अपने को कहने का, अपने को पहचानने का बहुत बड़ा साधन छिन गया। ऐसा सोचने वालों में बालकृष्ण शर्मा मनवीनफ, सेठ गोविंददास, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वंर दयाल सक्सेना, शमशेर और नागार्जुन जैसे लोग थे। मप्रतीकफ तो बंद हो गया, लेकिन उसने जो ऊर्जा फैलाई थी, वह नए कवियों में अपने-अपने ढंग से विकसित होती रही।

रघुवीर सहाय को ही आकाशवाणी दिल्ली ने अज्ञेय से सीधे साक्षात्कार के माध्यम से रेडियो जीवनी तैयार करने का काम सौंपा था। 1984 में उन्होंने गोपालदास के सहयोग से यह साक्षात्कार पूरा किया था जिसकी रिकॉर्डिंग आज भी आकाशवाणी के पास मौजूद है। इस लंबे साक्षात्कार में जहां अज्ञेय के संपूर्ण व्यक्तित्व, विचार, परिवार और सृजन पर प्रश्नम पूछे गए हैं, दिनमान और प्रतीक पर भी प्रश्नश पूछे गए हैं। लेकिन पत्रकारिता में उनके योगदान को पृथक रूप में चिह्नित नहीं किया गया जबकि आगरा के मसैनिकफ और कोलकाता के विशाल भारत से शुरू हुई पत्रकारिता की उनकी यात्रा लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी उनकी साहित्य यात्रा।

साहित्य की तरह ही पत्रकारिता में भी अज्ञेय हटकर थे। उनकी पत्रकारिता अनुशासित और मुक्त थी। हालांकि साहित्य में अज्ञेय ने मैथिलीशरण गुप्त को अपना काव्य गुरु माना, लेकिन पत्रकारिता में उनके गुरु कौन थे, यह प्रश्नर उनसे कभी किसी ने पूछा ही नहीं।

पंडित महावीर प्रयाद द्विवेदी मानते थे कि संपादक की पहली परीक्षा इस बात से होती है कि वह कितना निर्भीक है। मसैनिकफ हो या मविशाल भारतफ, आकाशवाणी हो या मदिनमान, एवरीमैंस हो या नवभारत टाइम्स इस कसौटी पर अज्ञेय जी पूरे खरे उतरते हैं। आजीविका की तलाश में बनारसीदास चतुर्वेदी की मदद से मसैनिकफ के संपादक बने थे, जिसके स्वामी श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जैसे स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन संपादक के स्वाभिमान पर आंच आते ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी। मविशाल भारतफ के संपादक का पद तो उन्होंने स्वयं चतुर्वेदी जी से मतभेद के कारण छोड़ दिया था। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी और संपादक के स्वाभिमान के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। जिसका प्रमाण है कि एक लेख मांगने के लिए नए-नए लेखकों को भी बार-बार खत लिखकर तगादा करते थे, और उत्साही नौजवान पत्रकारों का लेखन स्वयं सुधारकर छापते थे।

हिंदी पत्रकारिता में साप्ताहिक मदिनमानफ का आना बिलकुल नया, साहसिक, सार्थक और अद्वितीय था। आजादी के लगभग दो दशक बाद शुरू हुआ मदिनमानफ का प्रकाशन हिंदी पत्रकारिता में आज भी अज्ञेय की अक्षय कीर्ति का स्तंभ है। अज्ञेय के जुड़ने के कारण मदिनमानफ का नाम पाठकों तक पहुंचने के पहले ही चर्चित और सुपरिचित हो गया था। दिनमान उनके लिए एक नई ऊर्जा और ताजी बयार की तरह थी। मराष्ट्र की भाषा में राष्ट्र का आह्वानफ के सूत्र वाक्य ने सबको मोह लिया था और इस आदर्श को मदिनमानफ ने अक्षरशः चरितार्थ किया था।

इसी तरह साप्ताहिक मदिनमानफ का क्षेत्राधिकार संपूर्ण सौरमंडल ही नहीं उससे भी आगे संपूर्ण ब्रह्मांड था। उसमें हर सप्ताह ज्ञान-विज्ञान, देश-विदेश, इतिहास, अनुसंधान, भाषा, खेल साहित्य से लेकर राष्ट्रीय अस्मिता और मानवता की गरिमा तक सबकुछ धड़कता था।

अज्ञेय ने हिंदी के बुद्धिजीवियों, परिवर्तन के लिए मचलते नौजवानों, अपनी पहचान बनाने की तलाश में लगे लोगों को एक साथ जोड़ा था। संपादकों की एक ऐसी टीम जुटाई थी, जिनमें कुछ लोग आकाशवाणी के दिनों से उनके सहयोगी रहे थे, लेकिन पाठकों के बीच सुपरिचित नहीं थे। मनोहर श्याम जोशी ने इसे माना है कि रघुवीर सहाय के अतिरिक्त किसी की कोई पृथक पहचान नहीं थी।

वहीं फणीश्वनरनाथ रेणु के साथ घूमकर उन्होंने 1966 में बिहार के सूखे का जो मार्मिक विवरण चित्रों सहित छापा था, उसी की नकल करते हुए देश के दूसरे अखबारों ने भी यह प्रकाशित किया था। अब इस कथा से अवगत हैं कि मदिनमानफ से अलग होने के बाद इमरजेंसी के समय जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में अज्ञेय ने कितना बड़ा जोखिम उठाकर कितनी बड़ी भूमिका निभाई थी।

उस दौर में देश के अनेक साहित्यकारों और बड़े पत्रकारों का आचरण कैसा था, इस बारे में पं विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है। 1965 फरवरी में उन्होंने मदिनमानफ साप्ताहिक का संपादन स्वीकार किया। घर-बाहर दिनमान में जाने का विरोध भी हुआ, घर इसलिए कि स्वास्थ्य परिश्रम के लिए अनुकूल नहीं है और बाहर इसलिए कि पत्रकारिता की बाधा है। पर एक तो वे इसके लिए वचनबद्ध हो चुके थे, दूसरे वे हिंदी पत्रकारिता के स्तर को ऊंचा उठाने अपना योगदान करना चाहते थे। साथ ही वे अपने लिए प्रयोग भी करना चाहते थे कि सहृदय ही नहीं, जन-साधारण पात्र के स्तर पर मैं प्रेषणीय बनूं। इसके अलावा एक जबरदस्त कारण था। अज्ञेय स्वातंत्र्योंत्तर भारतवर्ष में अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का निर्वाह करने के लिए यह जरूरी समझने लगे थे कि गैर पेशेवर राजनीतिक मत का सामने आना आवश्यक हो गया है। पेशेवर राजनीतिज्ञों के हाथ में देश को सौंपकर चुपचाप बैठ जाना जनतंत्र के लिए वांछनीय नहीं है। मदिनमानफ में उन्हें सबसे पहला अनुभव यह हुआ कि हिंदी की प्रतिष्ठा की बुनियाद हिंदी की प्रेषणीयता में है, हिंदी की आंतरिक शक्ति में है। हिंदी के पाठक की सुरुचि, प्रबुद्धता और जिज्ञासा में ही हिंदी की वास्तविक शक्ति में है। इस विश्वाैस ने उन्हें अपनी समूची संगठन-शक्ति, कल्पना और मनोनयन को लगाकर मदिनमानफ के विकास में झोंक दिया।

दिसंबर 1972 में उन्होंने श्री जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर अंग्रेजी के नए वैचारिक साप्ताहिक मएवरीमैंसफ का संपादकत्व ग्रहण किया। लेकिन सालभर तक इस साप्ताहिक को एक निश्चिजत आकार देने के बाद उन्होंने अनुभव किया कि यद्यपि ऊपर से कागज पर संचालन एक स्वायत्त दिखने वाली संस्था का है पर परिस्थितिवश भीतर से इसका प्रबंध क्रमशः अधिकाधिक एक व्यक्ति के हाथों में जा रहा है। मएवरीमैंसफ की बदली हुई स्थिति उन्हें स्वीकार नहीं थी, इसलिए वे दिसंबर 1973 में इस पत्र से अपने-आप अलग हो गए और दिसंबर 1973 में मनया प्रतीकफ नाम से मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। अज्ञेय के साहित्यिक लेखन को लेकर जितना विवाद खड़ा किया गया उतना संपादन-कर्म को लेकर नहीं था। प्रसिद्ध कवि, आलोचक और मपूर्वग्रहफ के संपादक रहे अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि मअज्ञेय का खुले दिमाग से वस्तुनिष्ठ आकलन नहीं किया गया। समूची हिंदी में उन जैसा कोई लेखक नहीं हुआ जिसने इतनी अधिक विधाओं में एक समान मूर्धन्यता पाई हो। एक अन्य लेखक में उन्होंने रेखांकित किया था कि वे स्वाधीनता, व्यक्ति गरिमा, वरण की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के पक्षधर थे। उन्होंने मप्रतीकफ को जिस तरह सुरुचि और परख का अचूक प्रतिमान बनाया था उस तरह का गौरव दूसरी कोई पत्रिका आज तक नहीं पा सकी।

अपने संपादन-कर्म पर स्वयं अज्ञेय की एक टिप्पणी महत्वपूर्ण है जो उन्होंने एक लेख मकलकत्ते की यादफ में की थी। यह लेख हिंदी साहित्य बंगीय भूमिकाफ नामक पुस्तक में शामिल है, जिसका संपादन पंडित कृष्ण बिहारी मिश्र और रामव्यास पांडे ने किया है। उन्होंने लिखा मजहां भी में संपादक रहा हूं लगातार अपना उत्तराधिकारी तैयार करता रहा हूं। इसे मैं काम के प्रति अपना कर्तव्य समझता हूं और अपनी आजादी का अंग भी। मैं यह नहीं चाहता हूं कि किसी काम के साथ मैं केवल इसलिए बंधा रहूं कि इसे और कौन संभालेगा। यह शायद भारतीय प्रवृत्ति भी नहीं है, क्योंकि यहां तो लगातार यही देखता आया हूं कि शीर्षस्थ व्यक्ति सबसे पहले अपने आसपास एक शून्य बना लेता है, जिससे वह अपने को सुरक्षित समझ सके और कुछ योग्य व्यक्तियों को काफी नीचे स्तर पर रखकर उनसे कुछ ऐसे ढंग से काम लेता है जैसे बंधुआ मजदूरों से लिया जाता है।फ साप्ताहिक मदिनमानफ और दैनिक मनवभारत टाइम्सफ का दौर ऐसा था जिसमें अज्ञेय की पत्रकारिता किसी सीमा तक उनकी आजीविका भी थी। मदिनमानफ की लोकप्रियता का लाभ उठाने के बाद भी टाइम्स समूह के प्रबंधकों से मतभेद के कारण ही उन्हें मदिनमानफ छोड़ना पड़ा था। इसी तरह इमरजेंसी के समर्थन के कारण मनव भारत टाइम्सफ की अलोकप्रियाता चरम सीमा पर थी तो बड़ी खुशामद करके अज्ञेय को लाया गया था। इसके पीछे जनता पार्टी सरकार में अज्ञेय की सम्मानित छवि को भुनना भी था।

अगस्त 1977 में संपादक के रूप में आने के बाद उन्होंने देखा कि विरासत में मिले उस ढांचे में अवरोध अधिक थे और सार्थक बदलाव की संभावनाएं बेहद कम। उस दौर के अखबार के साप्ताहिक परिशिष्टों, संपादकीय पृष्ठों पर अज्ञेय की मौजूदगी दर्ज है। मदिनमानफ हो या मनवभारत टाइम्सफ उन दिनों अज्ञेय ने पत्रकारिता के माध्यम से जिन सवालों को उठाया था वह उनके भविष्यदर्शी संपादक होने का प्रमाण है। मनवभारत टाइम्सफ में उनके सहयोगी रहे डॉ. नंदकिशोर त्रिखा बताते हैं कि अज्ञेय ने अपनी शर्तों पर लेकिन पूरी किमत चुकाकर संपादक का काम किया था। उसी समय से हिंदी के लेखकों को सबसे अधिक सम्मान और पारिश्रमिक मिलने लगा था। अज्ञेय दूसरे प्रेस आयोग के सदस्यों थे। टाइम्स प्रबंधन ने आयोग से असहयोग करने के लिए आदेश जारी किया था लेकिन अज्ञेय को यह मंजूर नहीं था। शायद इसी कारण प्रबंधन ने संपादक पद पर उनके सेवाकाल को विस्तार नहीं दिया था।

मदिनमानफ से अलग होने से 18 साल बाद उनके सहयोगी रहे, त्रिलोक दीप ने अज्ञेय से मप्रतीकफ, मदिनमानफ और समूची हिंदी पत्रकारिता को लेकर एक लंबी बातचीत की थी जो अज्ञेय के निधन के बाद 19 से 25 अप्रैल, 1987 के अंक में प्रकाशित हुई थी। अज्ञेय ने पत्रकारिता की भाषा के प्रश्नल पर कहा था, मदिनमानफ में मैंने भाषा की ओर अधिक ध्यान दिया था। मैंने अपने सहयोगियों के मन में याह बात बैठा दी थी कि मदिनमानफ में हम जो कुछ लिखेंगे, भले ही उसकी सामग्री कहीं से अनुवाद करके ही पाई हो, उसके इसी रूप में प्रस्तुत करेंगे जैसे कि वह मूल हिंदी में ही लिखा गया है। अनुवाद की भाषा हम नहीं चाहते थे, हम मौलिक पत्रकारिता की भाषा चाहते थे।फ समाचार साप्ताहिक होने के बावजूद मदिनमानफ को कोई एजेंसी सेवा या फोटो सेवा उपलब्ध नहीं थी। अंग्रेजी अखबारों के लिए बेकार और फालतू चित्रों को मदिनमानफ में भेज दिया जाता था। अज्ञेय को इस बात की पीड़ा थी कि हिंदी पत्रकारिता में समाचार पत्रकारिता का विस्तार तो हुआ लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता में अधिक प्रगति नहीं हुई। पत्रकारिता उद्योग बनती जा रही है। उद्योग आदर्शवादी नहीं होते, इसलिए आज ऐसे संपादक तो हैं जो प्रशासन की दृष्टि से अधिक कुशल हैं लेकिन निष्ठावाले संपादक शायद दुर्लभ हैं।

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