विशेष संवाददाता, बंगाल – प्रकाश पाण्डेय,
संयुक्त राष्ट्र की आंकड़ों की माने तो साल 2024 तक भारत की आबादी चीन की आबादी से ज्यादा हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक रिपोर्ट पर आत्ममंथन करने की जरूरत है, रिपोर्ट के अनुसार चीन से भारत जनसंख्या के मामले में आगे निकलने वाला है।
भारत की आबादी पहले के अनुमान से करीब दो साल बाद साल 2024 तक चीन की आबादी को पार कर जाएगी। संयुक्त राष्ट्र ने ये दावा किया गया है। वही कहा गया है कि भारत की जनसंख्या 2030 तक 1.5 अरब होने की संभावना है।
मौजूदा समय में चीन की आबादी 1.41 अरब है और भारत की आबादी मौजूदा समय में 1.34 अरब है। इन दोनों की विश्व आबादी में 19 फीसद और 18 फीसद हिस्सेदारी है। 24वें दौर का अनुमान था कि भारत की आबादी 2022 तक चीन की आबादी को पार कर जाएगी। नए अनुमान के मुताबिक 2024 में दोनों देशों की आबादी 1.44 अरब के आसपास होगी। 2030 में भारत की आबादी 1.5 अरब और 2050 में 1.66 अरब होने का अनुमान है। चीन की आबादी 2030 तक स्थिर होगी, जिसके बाद गिरावट का दौर शुरू होगा, जबकि भारत की आबादी में 2050 के बाद कमी आएगी।
भारत के कुछ राज्यों की जनसंख्या कुछ देशों की जनसंख्या के बराबर है। जैसे, महाराष्ट्र की जनसंख्या मैक्सिको के बराबर यानि 104 मिलियन है। वहीं वियतनाम की आबादी पश्चि म बंगाल के बराबर 85 मिलियन है। झारखंड की आबादी की बात करे तो यहां की कुल आबादी 29 मिलियन है जो युगांडा के बराबर है और ओडिशा की आबादी अर्जेंटीना के बराबर 39 मिलियन है।
इसके अलावा यह भी सामने आया है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या 25 साल से कम उम्र के आयु वर्ग में आती है, जबकि 65 प्रतिशत 35 साल के कम उम्र के आयु वर्ग में है। अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2025 में 64 प्रतिशत युवा होंगे। 11 प्रतिशत 60 साल की आयु से ज्यादा और 14 साल तक की आयु वाले बच्चे 25 प्रतिशत होंगे।
देश की 58 प्रतिशत जनसंख्या जननीय आयु वर्ग में हैं। इनमें से 53 प्रतिशत गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करते हैं। 2025 तक दुनिया में 50 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि के जिम्मेदार केवल देश के पूर्वी राज्य होंगे और केवल 13 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि पश्चिइमी देशों के हिस्से में आएगी।
अगर देश में शिशु मृत्यु दर पर रोक लगाने का लक्ष्य पूरा होता तो 2010 में देश की जनसंख्या 1107 मिलियन होती है, जबकि साल 2008 में ही हमारे देश की जनसंख्या इससे भी ज्यादा 1149.3 मिलियन थी। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत कुल फर्टिलिटी रेट यानि एक महिला द्वारा पैदा किए गए बच्चों की संख्या 2 हो, लेकिन आंकड़ों को देखें तो देश की प्रगति के साथ यहां के लोगों का स्वास्थ्य के प्रति नजरिया कुछ नकारात्मक ही रहा है। अब भी देश के राज्यों के फर्टिलिटी रेट को देखकर कह सकते हैं कि निर्धारित किए गए लक्ष्य से हम अभी बहुत पीछे हैं। इस आंकड़े को छूने के लिए तमिलनाडु को छोड़कर बाकी राज्यों को लंबा सफर तय करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश को अभी 18 साल और लगेंगे। मध्य प्रदेश को 16 साल, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड को 13 साल, बिहार और राजस्थान को 12 साल, असम और झारखंड को नौ से दस साल लगेंगे।
2007-2008 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के ग्रामीण इलाकों में 40-45 आयु वर्ग की महिलाएं सबसे ज्यादा 6 और सबसे कम दो बच्चों को जन्म देती हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे प्रति महिला 6 बच्चे हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान में प्रति महिला पांच बच्चे और सबसे कम केरल में प्रति महिला दो बच्चे हैं।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के लक्ष्य में यह भी शामिल था कि सही उम्र में विवाह को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें महिला के विवाह की उम्र कम से कम 18 साल हो और बेहतर हो यदि 20 साल हो। साल 2007-08 की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 साल से कम उम्र की विवाहित महिलाएं बिहार में सबसे ज्यादा 70 प्रतिशत, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में 59, झारखंड और पश्चिेम बंगाल में 58 और सबसे कम हिमाचल प्रदेश में नौ प्रतिशत हैं। इसके साथ ये भी जानना जरूरी है कि एक महिला द्वारा पैदा किए गए बच्चों की संख्या का उसके और बच्चे के जीवन पर कैसा असर पड़ता है।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत यह लक्ष्य रखा गया था कि बच्चे को जन्म देने वाली महिला की मत्यु दर प्रति एक लाख में 100 या इससे कम हो। आमतौर पर विकसित देशों में बच्चे को जन्म देने के समय प्रति 2800 में से एक महिला की मौत होती है, जबकि हमारे देश में प्रति 100 डिलीवरी में एक महिला की मृत्यु होने की आशंका रहती है और बाकी जो 99 प्रतिशत महिलाएं बच जाती हैं, वे या तो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं या किसी प्रकार के शारीरिक विकार की चपेट में आ जाती हैं।
• कितना सहेगी धरती
लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट के सीनियर फेलो डेविड सैटर्थवेट कहते हैं कि ऐसा नहीं है। डेविड के मुताबिक आबादी से ज्यादा अहमियत इस बात की है कि आप संसाधनों का इस्तेमाल कैसे करते हैं। वो महात्मा गांधी का हवाला देते हैं। गांधी जी ने कहा था कि धरती पर सबकी जरूरत भर का सामान है, मगर सबके लालच को पूरा करने लायक नहीं है। धरती पर पहले इंसानों की आबादी बहुत ज्यादा नहीं थी। वैज्ञानिक बताते हैं कि दस हजार साल पहले तक धरती पर महज कुछ लाख इंसान थे। 18वीं सदी के आखिर में आकर धरती की आबादी ने सौ करोड़ का आंकड़ा छुआ था। 1920 में जाकर, धरती पर दो सौ करोड़ लोग हुए थे।
आज की तारीख में दुनिया की आबादी सात अरब से ज्यादा है। 2050 तक ये आंकड़ा करीब दस अरब और 22वीं सदी के आते-आते धरती पर 11 अरब लोगों के होने का अनुमान है। 2012 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की 35 करोड़ महिलाएं अपना आखिरी बच्चा नहीं चाहती थीं। मगर उनके पास इतने अधिकार नहीं थे कि वो इसका फैसला ले सकें कि वो बच्चा पैदा करेंगी या नहीं। लेकिन अब भी एक अहम सवाल है कि क्या धरती 11 अरब लोगों के बोझ को बर्दाश्त कर पाएगी।