--- हरेन्द्र शुक्ला, वाराणसी।
वाराणसी : उतर प्रदेश में हो रहे निकाय चुनाव में जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यकुशलता पर मोहर लगेगी। वहीं पीएम नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र का नगर निगम वाराणसी के चुनाव पर देश की निगाहें टिकी हुई है। हालांकि यूपी के सीएम अपने मंत्रियों एवं विधायकों की फौज के साथ ताबड़तोड़ चुनावी प्रचार तो जरुर कर रहे है लेकिन डैमेज कंट्रोल में मश्क्कत भी करनी पड़ रही है।
यदि पीएम के संसदीय क्षेत्र के नगर निगम की बात की जाय तो यहा 22 वर्षों से भाजपा का ही मेयर पद पर कब्जा रहा है। इसके बावजूद काशी का नगर निगम क्षेत्र के लोग बुनियादी सुबिधाओं से हमेशा वंचित ही रहे है। यदि निवर्तमान मेयर के कार्यकाल में नगरीय क्षेत्र में विकास कार्यों पर नजर डाली जाय तो केवल डीपीआर बनाने का ही खेल हुआ है। शहर में स्वच्छता के नाम पर केन्द्र सरकार से जो भी धन आया उसका बंदरबाट ही हुआ है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ह्रदय योजना , गंगा घाटों की सफाई , वृक्षारोपण, पार्को -चौराहों का रखरखाव आदि पीएम के दौरे के समय ही माडल के तौर पर उनको दिखाने और अखबारों की फोटो लायक बना देने के बाद मामला टायं टायं फिस्स हो जाता है।
लोकसभा चुनाव के बाद यहां के निवर्तमान मेयर के नाम यह रेकार्ड बन गया है कि केन्द्रीय मंत्रियों का स्वागत जितना काशी में हुआ उतना स्वागत दुनिया के किसी देश के मेयर ने नहीं किया होगा। अबकी बार भाजपा ने जहां पूर्व सांसद स्व• शंकर प्रसाद जायसवाल की बहू मृदुला जायसवाल पर बाजी लागायी है वही कांग्रेस ने भी पूर्व सांसद स्व• श्यामलाल यादव की बहु शालिनी यादव पर दांव लगाकर बैठी हुई है। सपा ने अपने ही पार्टी के प्रदेश सचिव संजय गुप्ता की धर्मपत्नी साधना गुप्ता को चुनावी बागडोर सौंपकर परंपरागत मतों के अलावा साधना की सामाजिक उपलब्धियों को कैश करने की जुगत कर रही है।
एक बात तो तय है कि काशी की जनता अबकी बार परिवर्तन का मन बना चुकी है क्योंकि विगत 22 वर्षों में भाजपा के मेयर, पार्षदों, विधायकों की कलाबाजी झेल रहे इस शहर के आम जागरूक नागरिक भी यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि गंगा सफाई के नाम पर किस तरह अरबों रुपये के वारे-न्यारे किए गये हैं यदि किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी से 22 वर्षों में नगर निगम द्वारा कराये गये कार्यो की जांच करा दी जाय तो दुध का दुध और पानी का पानी सामने होगा।
दुनिया में सांस्कृतिक राजधानी के नाम से विख्यात काशी आज भी मूलभूत नागरिक सुविधाओं के लिए तरस रही है। भगीरथ के पूर्वजों को तारने वाली गंगा तट के निवासी शुद्ध पेयजल से महरूम हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग पेयजल के व्यवसाय से फलफूल रहा है। वहीं दूसरी ओर इस प्राचीन शहर को हाईटेक स्मार्ट सिटी का सपना दिखा कर इसके हेरिटेज स्वरूप से खिलवाड़ जारी है। अतिक्रमण से जहां 24 घंटे जाम से कराहता सड़कों-गलियों का हाल किसी से छिपा नहीं है। दैनिक सफाई व्यवस्था ठेकेदारों के निजी हाथों में सौप कर ऊंचे कमीशन का खेल खेलकर जनता से जहां दोहरा कर वसूला जा रहा है। नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार की बानगी यह है कि शहर के प्राचीन मुहल्लों में डेंगू के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में इसके इलाज की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। सीवर लाइन की दुर्दशा सहित स्ट्रीट लाइट और खुदी गलियों वाले खड़ंजे और चौका अपने जीर्णोद्धार की राह तकते हैं। पेयजल की पुरानी लाइनों से जुड़ी सीवर का पानी घरों में अपने साथ कीड़ों मकोड़ों व बदबू मुफ्त में लेकर आता है। यह जीवंत शहर अब क्योंटों बनने से रहा, इसे इसके धार्मिक स्वरूप के साथ ही बरकरार रखा जा सके तो गनीमत है। भवनों के करों के ढाँचा में अप्रत्याशित वृद्धि करके इस शहर के समस्त सरकारी विभागों को ठेकेदारों की कृपा पर छोड़ दिया गया है।
नगर निगम की बेशकीमती संपत्तियों सहित अधिकांश मंदिर, मठों, धर्मशाला की संपत्ति पर संगठित माफियाओं ने कब्जा करके चहुँ दिशा में व्यावसायिक कटरे-कॉम्प्लेक्स फ्लैट के धंधे से करोड़पति हो गए। इस बार आम जनमानस 22 वर्षों की उपलब्धियों के मूल्यांकन के आधार पर निर्णय लेगी। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। इस बार एन्टी कंबेंसी फैक्टर कार्य करेगा, करोड़पति ठेकेदार प्रजाति के पार्षद जनमानस की निगाह में हैं साथ ही इनकी कथित जनसेवा को इस शहर के निवासी भलीभांति जानते हैं। थानों से लगायत प्रशासन तक इनकी दलाली व विकास कार्यों में कमीशन खोरी जनता की निगाह में है। जिससे अप्रत्याशित नतीजे सामने आने वाले हैं। जागरूक जनता पार्टियों के सारे समीकरण ध्वस्त कर देगी।