विशेष संवाददाता, बंगाल – प्रकाश पाण्डेय,
वक्त हर शख्स की जिंदगी में अहमियत रखता है। वजह साफ है कि गुजरा वक्त कभी वापस नहीं आता है। जो आज है वो कल नहीं होगा और जो कल था वह आज हो नहीं सकता। इसलिए चलना ही जिंदगी है। घड़ी की सूईयां और पेंडुलम से सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।
कोलकाता को धरोहरों का शहर कहा जाता है। अंग्रेजों के जमाने की ऐतिहासिक इमारतों के अलावा कई और चीजें भी इस शहर में हैं जो धरोहर में शुमार हैं। इनमें ही शामिल हैं महानगर और इसके आसपास के ऐतिहासिक इमारतों में लगी घड़ियां, जो वर्तमान में अतीत की सदृश्य कहानी को बयां करती है। साल 1798 से 1805 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड वेसली ने कोलकाता के विकास के लिए टाउन डेवलपमेंट कमिटी का गठन किया था। इस कमिटी ने शहर को निखारने का काम किया। ऐसे इस शहर का इतिहास तीन सौ साल से ज्यादा पुराना है। मजे की बात यह है कि आज से हजारों साल पहले जब सभ्यताओं का विकास नहीं हुआ था उस समय लोग समय का या दिन बीतने का अनुमान कैसे लगाते रहे होंगे ये सवाल हर किसी के जहन में आ सकता है। इसके जवाब के लिए कल्पना करनी होगी कि कैसे उस दौरान प्रकृति पर निर्भर रहे लोग वक्त को समझते होंगे।
प्राचीन समय में मनुष्य सूर्य की अवस्थाओं को समझ कर वक्त का निर्धारण किया करता था। हर पेहर का नामकरण कर दिया गया था। जैसे, भोर, दोपहर, संध्या और रात्रि। एक समय ऐसा भी था जब आम लोगों के पास घड़ियां नहीं होती थी, उस समय शहर की ऊंची इमारतों पर बड़ी-बड़ी घड़ियां लगी होती थी, और ये घड़ियां हर 60 मिनट के अंतराल में घंटी दिया करती थी ऐसे में वहां से गुजरने वाले लोग समझ जाया करते थे कि कितना समय हुआ है। दुनिया की कई मशहूर इमारतों में आज भी वो पुरानी घड़ियां लगी हैं और सैकड़ों साल से वो चल भी रही हैं।
महानगर की सड़कों के इर्द-गिर्द कई ऐतिहासिक इमारतें देखने को मिलती है और इन इमारतों के ललाट यानि शीर्ष पर एक घड़ी वहां से गुजरने वाले हर आम को वक्त बताने के लिए लगी होती है। ये घड़ियां उनकी पेहर की शुरुआत और पेहर समापन की जानकारी देती है, बिना रूके लगातार अपनी चाल में फकीर की तरह चलते हुए हर राहगीर को खुद की ओर झांकने पर मजबूर करती है। इन घड़ियों की चाल को लगातार बनाए रखने में पी.पी दत्ता एंड संस पिछले पांच पीढ़ी से लगी हुई है। इस परिवार का यही कारोबार है। दत्ता परिवार के एक सदस्य स्वप्न कहते हैं कि उनके दादा धरानी धर दत्ता अंग्रेजी हुकूमत के दौरान घड़ियां बनाया करते थे, इनके इस हुनर की प्रशंसा पूरे शहर में आम थी। स्वप्न और उनके भाई समीर अपने दादा से विरासत में हासिल हुए कारोबार को आज आगे बढ़ा रहे हैं। स्वप्न का बेटा सत्यजीत भी अब इस काम में लग गया है और तीनों मिलकर अब महानगर की उन घड़ियों की मरम्मत करते हैं जिसे शहर की धरोहर तालिका में शामिल किया गया है।
आज लोग मोबाईल पर निर्भर हो गए हैं उनकी हर जरूरत को मोबाईल पूरा कर रहा है। वक्त देखने से लेकर अंतर सम्प्रेषण तक की सुविधा इस नवीन तकनीक के जरिए सरल ढंग से हो रही है। ऐसे में इन ऐतिहासिक घड़ियों की अहमियत को समझने के लिए दत्ता परिवार के सदस्यों से मुलाकात जरूरी थी। अधिक जानकारी के लिए कॉलेज स्ट्रीट स्थित समर दत्ता के घर पहुंचा, जहां समर और उनके भाईयों से मुलाकात के दौरान कई अहम जानकारी हाथ लगी।
इमारत के कंगुरे पर लगी घड़ी को टॉवर घड़ी या क्लॉक टॉवर कहते हैं। कोलकाता शहर और इसके आसपास के इलाकों में ऐसे दर्जनों टॉवर्स हैं। पूर्व औपनिवेशिक भारत में टावर अज्ञात नहीं थे। टॉवर घड़ी को आयात किया जाता था। आज समय बदला है और तकनीकी विकास की वजह से लोग मोबाईल पर निर्भर हो गए हैं। 19वीं शताब्दी के मध्य में इन विशाल इमारतों को विक्टोरियन इंग्लैंड के शहरीकरण को दर्शाने के लिए मूल रूप से लगाया गया था। समर ने बताते हैं कि बीबीडी बाग स्थित जीपीओ, न्यू मार्केट, एस्पलेनड के मेट्रोपोलिटन बिल्डिंग में लगी घड़ियों की मरम्मत वे व उनके परिवार के सदस्य करते आए हैं। इसके अलावा शहर के विभिन्न निजी स्वामित्व वाले चर्चों जैसे, डलहौजी स्क्वायर स्थित सेंट जॉन, ब्रेबॉर्न रोड स्थित आर्मेनियन चर्च, जोरा गिरजा या एजेसी बोस रोड स्थित सेंट जेम्स चर्च की घड़ियां भी ये ही लोग ठीक करते हैं।
एक समय ऐसा आया जब ये विरासतीय धरोहर ढह रहे थे। उस समय इन्हें बचाने के लिए राज्य विरासत समिति आगे आई और इन इमारतों के साथ-साथ इन इमारतों में लगी घड़ियों की रख रखाव व निगरानी करने लगी। प्रति घड़ी की वार्षिक रख रखाव शुल्क 15,000 से 20,000 रुपए के बीच होती है। हाल ही में दत्ता एंड संस ने हुगली जनपद स्थित सेरामपुर चर्च के 400 साल पुरानी घड़ी की मरम्मत की।
साल 1990 में इन्हीं लोगों ने बैंडेल चर्च में भी घड़ी लगाई थी। समर बताते हैं कि हर घड़ी की अपनी विशिष्ट आवश्यकताएं हैं। मेट्रोपॉलिटन बिल्डिंग और न्यू मार्केट में लगी घड़ी को सात दिनों में एक बार देखना पड़ता है। वैसे ही अर्मेनियन चर्च में लगी घड़ी को तीन दिन में एक बार, जीपीओ में लगी घड़ी को हर एक दिन बीच लगा कर, तो सेंट जॉन में प्रत्येक दिन देखना पड़ता है।
आगे वो कहते हैं कि घुमाव का मतलब है घड़ी में एक क्रैंक फिक्स करना और इसे पूर्ण सर्कल में बदल देना। इस तरह के भारोत्तोलन और कायाकल्प में वे लोग विश्वाकस नहीं करते हैं। हंसते समर ने कहा कि हम भी कोई सुपरमैन नहीं है। हां, जब रविवार को कर्मचारी छुट्टी पर होते हैं तो उस समय थोड़ा काम हमलोग खुद से ही कर लेते हैं। बातचीत के दौरान आंखों को यहां वहां करने पर घर के एक छोर पर एक पर्ची तो दूसरे छोर पर एक मेज, उच्च शक्ति बल्ब, चश्मा, बहुत से स्क्रूड्राइवर और कॉलिपर्स देखने को मिले, वहीं पास में एक सुंदर सी नीली और सफेद टेबल की घड़ी रखी नजर आई। कमरे का आकार बहुत ज्यादा फैलाव में नहीं दिखा यानि छोटा सा रूम। ये लोग प्राचीन घड़ियों की भी मरम्मत करते हैं। ये भी इनके कारोबार का एक हिस्सा ही है।
बिना जिज्ञासा के ही समर के समीप बैठे स्वपन हैदराबाद के सालारजंग संग्रहालय में ब्रिटिश ब्रैकेट घड़ी की तर्ज पर निर्मित एक जुलूस घड़ी की खासियत बताने लगे। उन्होंने कहा कि ये घड़ी समय के साथ-साथ दिन, महीने की तिथि और चंद्रमा के चरणों के बारे में बताती है। इसके अंदर चालाक गैजेट है और ये घड़ी संग्रहालय का एक मुख्य आकर्षण केंद्र है। कहा जाता है कि यह घड़ी 19वीं सदी की है और संगीतमय है। इसे इंग्लैंड से लाया गया था। संग्रहालय का नाम नवाब तुरब अली खान के नाम पर पड़ा, जिन्हें सालारजंग प्रथम के नाम से भी जाना जाता था। आखिर में उन्होंने बताया कि बहुत पहले वे एक बार हैदराबाद गए थे उस समय उन्हें इस घड़ी को देखने का सौभाग्य मिला था।
तह और तहकीकात में इतिहास की पड़ताल अनिवार्य हो जाती है, क्योंकि इतिहास को जाने बिना कोई भी तलाश मंजिल तक नहीं पहुंच पाती। घड़ी का आविष्कार किसने किया? इस पर मतभेद है। भारतीय ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में पहली बार पानी और बालू से समय नापने के यंत्र बनाने का जिक्र मिलता है। दुनिया में सबसे पहले घड़ी का निर्माण कब हुआ और किस देश में सबसे पहले घड़ी बनाई गई, ये एक बड़ा सवाल है। हालांकि घड़ी के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण तो नहीं मिलते हैं, लेकिन जो भी जानकारी हासिल है उसके मुताबिक सबसे पहले 15वीं शताब्दी में एक प्राचीनतम घड़ी पेंटिग में देखने को मिली थी और ये पेंटिंग ड्यूक ऑफ लॉरैंस, कोसीमो प्रथम की है। 1955 में पहली बार परमाणु घड़ियों पर विचार किया गया, परमाणु घड़ी के कई उपयोग हैं मसलन जीपीएस यानि ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम के साथ ही ये इंटरनेट में भी उपयोगी हैं। रेडियो ट्रांसमीटर में भी ये इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि लॉन्ग वेब और मीडियम वेब ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन को ये सटीक वेव्स मुहैया कराने में मदद करती हैं।
• कोलकाता में लंदन का आईना है रेप्लिका
रात की रौशनी में कोलकाता का लेक टाउन लंदन सा नजर आता है। यहां समय बताती रेप्लिका टावर, ब्रिटेन की संसद के सामने लगी उस घड़ी की तर्ज पर बनी है जिसे ब्रिटेन में द बिग बेन के नाम से जाना जाता है। रेप्लिका टावर की लम्बाई 30 मीटर है। हालांकि लंदन की द बिग बेन, रेप्लिका से तीन गुना ज्यादा बड़ी है। इस टावर के निर्माण की पहल स्थानीय विधायक सुजीत बोस और दक्षिण दमदम नगरपालिका के चेयरमैन मृगंका भट्टाचार्य ने की और इसके निर्माण में कुल 1.36 करोड़ की लागत लाई और इसका निर्माण एंग्लो स्विस कंपनी ने किया है।
रेप्लिका के निर्माण में आए खर्च को लेकर विरोधियों की ओर से ममता सरकार पर निशाना भी साधा गया और कहा गया कि दीदी अपने मन की कर रहीं हैं, उन्हें बंगाल के लोगों की फिक्र नहीं है। पश्चिगम बंगाल और खासकर कोलकाता की अपनी एक अलग पहचान रही है, ऐसे में वे अपने सपनों की योजना सूची कोे त्याग कर कोलकाता को कोलकाता ही रहने दे, यहां के लोगों को लंदन की नहीं, अन्न और रोजगार की जरूरत है।
लेक टाउन बांगूर एवेन्यू, दमदम पार्क और केष्टोपुर से घिरा है। इसके पूर्व में साल्ट लेक तो दक्षिण में बेलगछिया, उल्टाडांगा और पश्चिमम में पातीपुकुर, पाइकपाड़ा है। यहां से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है।
एक समय था जब कोलकाता शहर की ज्यादातर इमारतों में घड़ियां लगी होती थी, समय के साथ न ही घड़ियों की देख रेख हो सकी और न ही इमारतों को बचाया जा सका। ज्यादातर इमारते खंडहर में तब्दील हो चुकीहैं और ऐसे में यहां की इतिहास को जीवित रखने और घड़ियों की सुईयों को चलाने के लिए कुछ हो रहा है तो उसे साफ चश्मे से देखने की जरूरत है। जहां तक बात शहर के लंदन स्वरुप की है तो यहां की देश काल परिस्थितियां लंदन सी नहीं है और न ही लंदन जैसे लोग, फिर लंदन स्वरुप की संरचना व योजना मिथ्या के समान है।