सरदार सरोवर बांध: मध्यप्रदेश को 7,769 करोड़ मिलने की जगह 550 करोड़ चुकाने की नौबत?



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■अपने हितों की आहूति देकर नतमस्‍तक हो गई मप्र सरकार

■हजारों विस्‍थापितों के हकों पर मध्‍यप्रदेश सरकार का डाका

सरदार सरोवर बांध को लेकर हुई हालिया बैठक के बाद मध्यप्रदेश के हितों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। दावा किया जा रहा है कि मध्‍यप्रदेश को परियोजना से जुड़े वित्तीय समायोजन में गुजरात से लगभग 7,769 करोड़ रुपये प्राप्त होने चाहिए थे, उसी मध्यप्रदेश पर अब करीब 550 करोड़ रुपये के भुगतान का दायित्व आ गया है। यह राज्य के लिए बड़ा वित्तीय झटका है। सबसे अधिक डूब क्षेत्र और विस्थापन मध्यप्रदेश में होने के बावजूद राज्य ने अपने हितों से समझौता किया। यहां मप्र सरकार ने अपने हितों को दरकिनार करते हुए बैठक में नतमस्‍तक हो गई। और 7,769 करोड़ का नुकसान करवा लिया। जाहिर मुख्‍यमंत्री मोहन यादव ने भाजपा की गुजराज लॉबी के दवाब में आकर इस तरह समझौता करके मध्‍यप्रदेश की जनता के साथ विश्‍वासघात किया है। यह विवाद 30 वर्षों से चल रहा था और गुजरात पर मध्‍यप्रदेश की अदायगी थी लेकिन गुजरात शुरू से ही पैसे देने में आनाकानी करता आ रहा था।

सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा घाटी की सबसे महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय योजनाओं में से एक है, जिसमें जल, बिजली और लागत का बंटवारा संबंधित राज्यों के बीच तय नियमों के अनुसार किया जाता। इस मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। यह केवल वित्तीय मामला नहीं बल्कि राज्य के दीर्घकालिक आर्थिक हितों से जुड़ा विषय है। इस निर्णय का असर करोड़ों लोगों और राज्य की विकास योजनाओं पर पड़ सकता है। राज्य सरकार की ओर से अपेक्षित मजबूती के साथ पक्ष नहीं रखे जाने के आरोप लग रहे हैं। नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध का उद्देश्य गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच जल एवं बिजली का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना था। लेकिन समय-समय पर जल प्रबंधन और बांध के संचालन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। मध्यप्रदेश नर्मदा बेसिन का सबसे बड़ा भागीदार होने के बावजूद अपने अधिकारों का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा है। यह परियोजना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और जल सुरक्षा से जुड़ा विषय है। बैठक में वास्तव में मध्यप्रदेश की प्रमुख मांगों की अनदेखी हुई है, इसे राज्य के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।

●मध्‍यप्रदेश की 55 फीसदी जमीन डूबी

सरदार सरोवर बांध में सबसे ज्‍यादा जमीन मध्‍यप्रदेश की ही डूबी है जो 55 फीसदी के लगभग है। बावजूद इसके इस बांध का लाभ सबसे ज्‍यादा गुजरात को हो रहा है। मध्यप्रदेश में लगभग 19,628 हेक्टेयर भूमि सरदार सरोवर के जलाशय में डूब क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इसमें करीब 2,809 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल है। लगभग 178 गांव परियोजना के डूब क्षेत्र से प्रभावित हुए हैं। निजी भूमि और मकानों का मुआवजा दिया जा चुका है, जबकि राजस्व भूमि, वन भूमि और खनिज क्षेत्र के मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश और गुजरात के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। डूब का प्रभाव मुख्य रूप से धार, बड़वानी, खरगोन और अलीराजपुर जिलों के गांवों पर पड़ा है। हजारों परिवारों का पुनर्वास किया गया। बड़ी मात्रा में कृषि भूमि जलाशय में समा गई। आदिवासी बहुल क्षेत्रों के अनेक गांव प्रभावित हुए। पुनर्वास, मुआवजा और बैकवॉटर स्तर को लेकर वर्षों से विवाद और कानूनी मामले चलते रहे हैं।

●सवाल हजारों विस्‍थापितों का भी है

विवाद केवल पैसों तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न उन हजारों परिवारों का है, जिन्होंने सरदार सरोवर परियोजना के लिए अपनी जमीन, घर और आजीविका खोई। परियोजना का सबसे बड़ा डूब क्षेत्र मध्यप्रदेश में है और सर्वाधिक विस्थापन भी यहीं हुआ। ऐसे में यदि राज्य अपने वित्तीय और पुनर्वास संबंधी अधिकारों पर पर्याप्त मजबूती से दावा नहीं रख पाया, तो इसका सीधा असर प्रभावित परिवारों के हितों पर पड़ सकता है।

●कर्ज में डूबी सरकार और अपने हिस्‍से का पैसा भी दे आये

एक तरफ मोहन सरकार कर्ज की बैशाखी पर चल रही है वहीं दूसरी तरफ अपने हक के पैसों को लेने में नाकाम साबित हुई। प्रदेश की आर्थिक‍ स्थिति बेहद चिंताजनक है। सरकार को बार-बार कर्ज लेना पड़ रहा है। उसके बावजूद प्रदेश को 550 करोड़ रूपये का भुगतान करने का समझौता होना प्रदेश के साथ अन्‍याय है। गुजरात सरकार पर जो लेनदारी बन रही थी वह मप्र के हक था और उसके साथ-साथ उन परिवारों का भी था जिनके घर उजड़े हैं, जिनकी जमीनें डूबी हैं। लेकिन सरकार ने तो न अपना हित देखा और न ही विस्‍थापितों का दुख-दर्द समझा।

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