--के. विश्वदेव राव
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।
आज का युग विचित्र विरोधाभासों से भरा हुआ है। हमारे पास संसार भर से बात करने के अनगिनत साधन हैं, परंतु पास बैठे व्यक्ति को सुनने के लिए समय नहीं है। हम हजारों कोस दूर बैठे अनजान व्यक्ति से पल भर में जुड़ सकते हैं, किंतु बगल में बैठे सहयात्री या अपने ही घर के सदस्य की उपस्थिति से अनजान बने रहते हैं। तकनीक ने संसार की दूरियां तो मिटा दी हैं, परंतु हमारे बीच की आत्मीय दूरी इतनी बढ़ा दी है कि समाज की परंपरागत संरचना ही डगमगाती दिखाई पड़ रही है। कुछ क्षणों के छोटे वीडियो की चमक-दमक में हमारा वास्तविक जीवन, हमारी शालीनता और हमारे सबसे प्रिय संबंध धीरे-धीरे धुंधले पड़ते जा रहे हैं।
इस स्थिति को "घरेलू एकांत के मुद्रीकरण" के नाम से समझा जाना चाहिए। आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि सामाजिक माध्यमों ने मनुष्य के "एकांत" को एक बिकाऊ वस्तु बना दिया है। सदियों से मनुष्य का घर उसका सुरक्षित दुर्ग रहा है, जहां वह पूर्णतः सहज और बनावट से परे रहता था। छोटे वीडियो बनाने की होड़ ने हमारे शयनकक्षों और रसोईघरों को सार्वजनिक रंगमंच में बदल दिया है। हम अनजाने में अपनी सबसे निजी भावनाओं, आंसुओं और पारिवारिक कलह को देखने वालों की संख्या के लिए बेच रहे हैं। मानव इतिहास में यह पहला अवसर है जब मनुष्य स्वेच्छा से अपने एकांत को वस्तु का रूप दे रहा है।
विडंबना देखिए: जो क्षण कभी हमारे निजी जीवन का सबसे अनमोल भाग हुआ करते थे, जैसे परिवार संग भोजन करना, किसी पर्व की प्रसन्नता, या किसी दुख में अपनों को ढाढ़स बंधाना, आज वे सभी क्षण दिखावे की सामग्री में परिवर्तित हो चुके हैं। रिश्तों की ऊष्मा अब कैमरे के लेंस से नापी जा रही है।
इस डिजिटल सन्नाटे के बीच अतीत का वह दौर याद आता है, जब संवाद का माध्यम कोई आभासी पटल नहीं, बल्कि आतुरता, उत्सुकता और गहरी व्याकुलता से भरा एक अदना सा “पोस्टकार्ड” हुआ करता था। उस सीधे, सरल और सादे युग में पत्र की प्रतीक्षा में एक आत्मीय ऊष्मा होती थी। उस साधारण आयताकार गत्ते के टुकड़े यानी “पाती में ही समूची बाती” समाई होती थी, चाहे वह भली हो या बुरी। जनसाधारण की अभिव्यक्ति का यह साधन, आज इंटरनेट, व्हाट्सऐप, ट्विटर और अन्य माध्यमों की चकाचौंध में इतिहास के पन्नों और संग्रहालयों में सिमट कर रह गया है।
सोचने वाली बात यह है कि उस दौर में संवाद का मुद्रीकरण नहीं हुआ था, बल्कि उसमें एक अनूठा विश्वास था। व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो 50 पैसे में बिकने वाले इस पोस्टकार्ड की निर्माण लागत भले ही ₹6 आती हो, लेकिन यह सरकारों के लिए घाटे का सौदा होने के बावजूद समाज को जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम था। आज कहां वह सादा पोस्टकार्ड और कहां यह आभासी दुनिया, जो मुफ़्त होने का नाटक तो करती है, लेकिन पर्दे के पीछे हमारे एकांत और भावनाओं का सौदा कर रही है।
मनोवैज्ञानिक इसे एक खतरनाक चक्र मानते हैं, जहां क्षणिक मिलने वाला सुखद रासायनिक स्राव मनुष्य के मनोभाव को तय करता है। जब हमारा मानसिक सुकून इस बात पर निर्भर हो जाए कि संसार हमारे विषय में क्या सोचता है, तो हम अपनी मौलिकता खो बैठते हैं।
इस अंधी दौड़ का सबसे पीड़ादायक प्रभाव हमारी संतानों पर पड़ रहा है। जिस आयु में बच्चों के हाथों में मिट्टी, खिलौने और पुस्तकें होनी चाहिए थीं, उस आयु में वे पटल के अभ्यस्त हो चुके हैं। बच्चे अब केवल दर्शक भर नहीं रहे, बल्कि वे स्वयं इसके प्रस्तुतकर्ता भी बनते जा रहे हैं।
हिंदी भाषी क्षेत्रों के गांवों, कस्बों और नगरों की एक जीवंत परंपरा रही है "चाय की टपरी पर होने वाली बैठकें"। जहां संध्या होते ही राजनीति से लेकर समाजशास्त्र तक और घर-गृहस्थी से लेकर खेती-किसानी तक पर गरमा-गरम वाद-विवाद हुआ करते थे। ये टपरियां केवल चाय पीने का स्थान नहीं थीं, बल्कि ये हमारे समाज के परस्पर जुड़ाव और तार्किक विचार-विमर्श के सबसे बड़े केंद्र थीं।
आज इन टपरियों का दृश्य बदल चुका है। वहां अब एक विचित्र सा सन्नाटा पसरा रहता है। चार लोग बैठते अवश्य हैं, परंतु चारों के सिर झुके होते हैं और आंखें अपने-अपने चलदूरभाष (मोबाइल) के पटल पर टिकी होती हैं। तकनीक ने हमसे आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे की आंखों में देखकर बात करने की कला छीन ली है। परंपरागत संवाद का स्थान अब भाव-चिन्हों ने ले लिया है। मुस्कान अब चेहरे पर नहीं, केवल कीबोर्ड के मुस्कुराते भाव-चिन्ह में शेष रह गई है।
इस संवाद-हीनता का लाभ उठाया है त्वरित संदेश भेजने वाले मंचों ने। इन मंचों ने सूचनाओं के आदान-प्रदान को तो तीव्र किया, परंतु साथ ही यह अफवाहों, झूठी खबरों और द्वेष फैलाने का सबसे बड़ा अस्त्र बन चुके हैं।
बिना किसी प्रमाणिकता के, केवल एक अग्रेषण-बटन दबाकर फैलाई जाने वाली झूठी खबरें आज समाज के ताने-बाने और परस्पर भाईचारे को छिन्न-भिन्न कर रही हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इन बंद समूहों में फैलने वाली अफवाहें मनुष्य की तार्किक बुद्धि को कुंद कर देती हैं। लोग बिना सोचे-समझे, बिना तथ्यों की जांच किए किसी भी बात पर विश्वास कर लेते हैं, जिससे सामाजिक विद्वेष और भीड़ द्वारा हिंसा जैसी घटनाएं जन्म लेती हैं।
समाधान की ओर एक कदम, हम तकनीक के विरोधी नहीं हो सकते, न ही इतिहास का पहिया पीछे घुमाया जा सकता है। समय आ गया है कि हम अपनी व्यस्त जीवनशैली में से कुछ समय यंत्रों से विराम लेने हेतु निकालें। यंत्र दूर रखकर अपने बच्चों के संग खेलें, चाय की टपरी पर अनजान लोगों से बात करें, और किसी भी अग्रेषित संदेश पर विश्वास करने से पहले अपनी तार्किक बुद्धि का प्रयोग करें। स्मरण रहे, पटल पर दिखने वाला पंद्रह पल का संसार मात्र एक छलावा है; वास्तविक जीवन उन लोगों के बीच है जो हमारे आसपास सांस ले रहे हैं।