मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों से फिर गरमाई सियासत



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■राजनीतिक गलियारों में फिर गरमाया नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा

■मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा से भाजपा में बढ़ी राजनीतिक हलचल

■मोहन यादव की कार्यशैली नहीं कर पा रही जनता को प्रभावित

■बीजेपी के वरिष्‍ठ नेताओं को साधने में नाकाम मोहन यादव

मध्यप्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री पद को लेकर एक बार फिर सियासी चर्चाओं का दौर तेज होता दिखाई दे रहा है। मंत्रालय के गलियारों से लेकर भाजपा के संगठनात्मक स्तर तक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व और संभावित बदलाव को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, ऐसा माहौल दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि मोहन यादव की कार्यशैली प्रदेश की जनता को प्रभावित नहीं कर पा रही है। किसान, युवा, व्‍यापारी वर्ग सरकार से नाराज दिखाई दे रहा है। खासकर किसान के मुद्दे पर सरकार विफल साबित हुई है। वहीं दतिया उपचुनाव में मिली हार से भी नकारात्‍मक माहौल बना है। ऐसे में यह सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय जरूर बन गया है कि यदि कभी नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति बनती है तो पार्टी की पहली पसंद कौन होगा? अब लंबे समय बाद मुख्यमंत्री परिवर्तन की चर्चाओं का फिर उभरना अपने आप में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

●क्या मोहन यादव से पार्टी में नाराजगी है?

मुख्यमंत्री परिवर्तन की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर डॉ. मोहन यादव को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष कितना वास्तविक है? राजनीतिक चर्चाओं में कुछ वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों के बीच मतभेदों का उल्लेख किया जा रहा है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह, नरोत्‍तम मिश्रा और नरेन्‍द्र सिंह तोमर जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम भी इन चर्चाओं के साथ जोड़े जा रहे हैं। हालांकि, किसी नेता की सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधि, प्रशासनिक निर्णयों पर असहमति या बयान को सीधे मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत अथवा नेतृत्व परिवर्तन की मांग मान लेना उचित नहीं होगा। भाजपा जैसे बड़े संगठन में अलग-अलग नेताओं की अपनी राजनीतिक भूमिका और प्रशासनिक प्राथमिकताएं होती हैं। कई बार सामान्य राजनीतिक मतभेदों को भी नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं से जोड़कर देखा जाने लगता है। इसके बावजूद यदि संगठन और सरकार के बीच समन्वय को लेकर लगातार सवाल उठते हैं तो शीर्ष नेतृत्व के लिए यह निश्चित रूप से चिंता का विषय हो सकता है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल को हमेशा प्राथमिकता देता रहा है।

●कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी बड़ा मुद्दा

राजनीतिक समीकरणों में केवल मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं का रुख भी काफी मायने रखता है। मध्यप्रदेश भाजपा का संगठन लंबे समय से मजबूत कैडर और बूथ स्तर के नेटवर्क के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की कोई वास्तविक स्थिति बनती है तो पार्टी संगठन उसे गंभीरता से ले सकता है। लेकिन कार्यकर्ताओं की कथित नाराजगी को व्यापक संगठनात्मक असंतोष मानने से पहले उसके प्रमाण और वास्तविक राजनीतिक प्रभाव का आकलन जरूरी होगा। चुनावी राजनीति में टिकट, पद, स्थानीय नेतृत्व और प्रशासनिक अपेक्षाओं को लेकर असंतोष समय-समय पर सामने आता रहता है।

●शीर्ष नेतृत्व के सामने असली चुनौती

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता और संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना है। मुख्यमंत्री बदलना केवल किसी एक व्यक्ति को हटाने या नए व्यक्ति को नियुक्त करने का निर्णय नहीं होता। इसके साथ मंत्रिमंडल, संगठन, क्षेत्रीय समीकरण, जातीय संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति जैसे कई पहलू जुड़े होते हैं। मध्यप्रदेश भाजपा के सामने यदि नेतृत्व परिवर्तन का कोई विकल्प कभी आता है तो उसे यह भी देखना होगा कि मौजूदा मुख्यमंत्री के कार्यकाल की राजनीतिक स्वीकार्यता क्या है और बदलाव का चुनावी लाभ कितना मिल सकता है। बिना स्पष्ट राजनीतिक लाभ के नेतृत्व परिवर्तन करना पार्टी के लिए जोखिम भरा कदम हो सकता है।

●केन्‍द्रीय नेतृत्‍व की निगाहों में प्रदेश की हलचल

मौजूदा स्थिति को 'नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं पर चल रही राजनीतिक चर्चा' के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। आने वाले दिनों में भाजपा संगठन की गतिविधियां, केंद्रीय नेतृत्व के फैसले, मुख्यमंत्री के कार्यक्रम और वरिष्ठ नेताओं के बयानों पर राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी। यदि पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक संकेत सामने आता है तो वर्तमान चर्चाओं को नई दिशा मिल सकती है। तब यह साफ होगा कि मध्यप्रदेश भाजपा केवल राजनीतिक अटकलों के दौर से गुजर रही है या वास्तव में प्रदेश के नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा फैसला आकार ले रहा है। फिलहाल मध्यप्रदेश की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह केवल सत्ता के गलियारों में उठी अफवाहों की लहर है या भाजपा के भीतर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की आहट? इसका जवाब आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।

●महिला नेतृत्व की चर्चा ने बढ़ाया सस्पेंस

प्रदेश में महिला चेहरे का नाम भी सामने आने की बात कही जा रही है। इसी क्रम में पूर्व मंत्री इमरती देवी ने कृष्णा गौर का नाम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना दिया है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में कृष्णा गौर का नाम फिलहाल अटकलों के दायरे में ही है।

ताजा समाचार

National Report



Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News