--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
रायपुर - छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष में पिस रहे आदिवासी
■वेदांता और अडानी जैसे समूह बन रहे पर्यावरण विनाश के काल
छत्तीसगढ़ भारत के उन राज्यों में से एक है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है। राज्य का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है और यहाँ घने साल, सागौन तथा मिश्रित वन पाए जाते हैं। बस्तर, सरगुजा, कोरबा, कांकेर, जशपुर और रायगढ़ जैसे क्षेत्र अपनी जैव विविधता तथा आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध हैं। इन जंगलों ने सदियों से लाखों आदिवासियों को भोजन, जल, औषधि और आजीविका प्रदान की है। किंतु पिछले कुछ दशकों में औद्योगिकीकरण, खनन परियोजनाओं तथा बड़े उद्योगों के विस्तार ने इन जंगलों पर गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। वनमंत्री केदार कश्यप और उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन छत्तीसगढ़ की पहचान मिटाने पर तुले हुए हैं। भविष्य की चिंताओं को दरकिनार कर उद्योगपतियों को जंगल के जंगल समर्पित कर रहे हैं। आदिवासियों के विरोध के बावजूद उदयोगपतियों को हसदेव जंगल दे दिया है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि पर्यावरणीय अनुमति से खनन तक में मंत्रियों को भारी भरकम लाभ दिया जाता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में खनिज के उत्खननों की अनुमतियां फटाफट दी जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ को देश की “खनिज राजधानी” भी कहा जाता है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसे खनिजों के विशाल भंडार हैं। इन संसाधनों के दोहन के लिए अनेक औद्योगिक घरानों तथा खनन कंपनियों को खदानों और परियोजनाओं की अनुमति दी गई। परिणामस्वरूप हजारों हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण हुआ और अनेक क्षेत्रों में जंगलों की कटाई तेज हो गई। विशेष रूप से हसदेव अरण्य, कोरबा और सरगुजा क्षेत्र वन विनाश के प्रमुख उदाहरण बनकर उभरे हैं। वेदांता और अडानी समूह राज्य के जंगलों का विनाश करने का बीड़ा उठाया है। विकास परियोजनाओं के नाम पर पर्यावरण के विनाश का खुला खेल चल रहा है। छत्तीसगढ़ के जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। औद्योगिक विकास और खनिज दोहन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को गति दी है, लेकिन इसके साथ वन विनाश, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट भी बढ़े हैं।
●खनन और औद्योगिक विस्तार के नाम पर आदिवासियों की आजीविका पर प्रहार
छत्तीसगढ़ में कोयला और लौह अयस्क की प्रचुरता के कारण बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं। कोरबा को देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है, जहाँ विशाल कोयला खदानें और ताप विद्युत संयंत्र स्थित हैं। इसी प्रकार रायगढ़, सरगुजा और बस्तर क्षेत्रों में भी अनेक खनन परियोजनाएँ संचालित हो रही हैं। खनन परियोजनाओं के लिए सबसे पहले वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई होती है। कई बार खुली खदान पद्धति अपनाई जाती है, जिससे विशाल भूभाग पूरी तरह उजड़ जाता है। सीएजी की रिपोर्टों में भी अवैध खनन और खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। लेकिन प्रदेश सरकार में बैठे विभागीय मंत्री और आला अफसर चंद प्रलोभन के कारण जंगलों को नष्ट करने की अनुमति दे रहे हैं।
●हसदेव अरण्य: संघर्ष का प्रतीक
छत्तीसगढ़ के वन विनाश की चर्चा हसदेव अरण्य के बिना अधूरी है। हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे बड़े सतत वन क्षेत्रों में से एक माना जाता है। हाल के वर्षों में यहाँ कई कोयला खनन परियोजनाओं को अनुमति दी गई। केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक जैसी परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति मिलने के बाद स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों ने विरोध दर्ज कराया। हसदेव अरण्य का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच चल रहे संघर्ष का प्रतीक बन गया है। एक ओर सरकार और उद्योग क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा तथा आर्थिक विकास की आवश्यकता बताते हैं, जबकि दूसरी ओर स्थानीय समुदाय जंगलों और आजीविका की रक्षा की मांग करते हैं। 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि और लगभग 4.48 लाख वृक्ष खनन परियोजना के लिए प्रभावित होने वाले हैं। पीईकेबी यानि पारसा ईस्ट और कांटा बासन, यह छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित एक प्रमुख कोयला खनन परियोजना है। इस खदान का मुख्य काम राजस्थान को बिजली बनाने के लिए कोयला निकालना है। परियोजना में लगभग 96,000 पेड़ काटे गए हैं।
●वेदांता समूह की सक्ति परियोजना
वेदांता समूह मुख्यतः खनन, धातु और ऊर्जा क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी है। वेदांता की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना सक्ति का 1,200 MW ताप विद्युत संयंत्र है, जिसके लिए लगभग 2,114 एकड़ भूमि उपयोग में लाई गई है। कंपनी के पास आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ होने का दावा है, लेकिन कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन के कारण पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर बहस जारी है। 2026 की औद्योगिक दुर्घटना ने सुरक्षा मानकों और नियामकीय निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। अप्रैल 2026 में सक्ती संयंत्र में विस्फोट हुआ जिसमें कम से कम 17 लोगों की मृत्यु हुई। इसके अलावा तमनार और गेवरा कोयला खदानें (रायगढ़-कोरबा), लारा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (एनटीपीसी) जैसी परियोजनाएं हैं जो सीधे तौर पर पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा रही हैं।
सच्चा विकास वही होगा जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करे। यदि जंगलों का अंधाधुंध दोहन जारी रहा तो भविष्य की पीढ़ियाँ एक समृद्ध प्राकृतिक धरोहर से वंचित हो जाएँगी। इसलिए छत्तीसगढ़ के जंगलों की रक्षा केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक अस्तित्व और सतत विकास का भी प्रश्न है।