युवाओं को 21वीं सदी के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं दृष्टिकोण से सुसज्जित करना



बंगलुरू, 10 जून 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

उपराष्ट्रपति एम• वेंकैया नायडू ने हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली के पुनर्निर्माण की अपील की है जिससे कि हम अपने युवाओं को 21वीं सदी के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं दृष्टिकोण से सुसज्जित कर सकें। वह रविवार बंगलुरू में श्री सत्य साईं उच्च शिक्षा संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोहों का उद्घाटन कर रहे थे।

श्री नायडू ने संस्थान के 50 वर्षों की यात्रा पूरी होने को एक ‘महत्वपूर्ण मील का पत्थर’ करार देते हुए कहा कि यह उपलब्धि एक असाधारण गुरू एवं रूपान्तरकारी नेता श्री सत्य साईं बाबा के दीर्घकालिक विजन का एक स्पष्ट प्रमाण है जिन्होंने दुनियाभर में लाखों लोगों को मानवता की सेवा में सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि शिक्षा प्रगति एवं विकास के प्रमुख उत्प्रेरकों में से एक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र तभी प्रगति करते हैं जब उसके नागरिक शिक्षित बन जाते हैं। 1964-68 के कोठारी आयोग की रिपोर्ट, जिसने देश की शिक्षा नीति को निर्धारित किया, को संदर्भित करते हुए श्री नायडू ने कहा कि हमारे देश की नियति ने हमारी कक्षाओं को आकार दिया है।

प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019, जो समस्त संबंधित मुद्दों को कवर करता है, का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने उत्कृष्टता एवं समानता के लिए लक्ष्य की चर्चा की और राष्ट्रीय आवश्यकताओं तथा लोकाचार के बीच संतुलन स्थापित करने तथा हमारे छात्रों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए तैयार करने की आवश्यकता रेखांकित की।

श्री नायडू ने एक व्यावहारिक भाषा नीति की अपील की जिसमें एक बहु-भाषी विश्व में हमारे युवाओं को आगे बढ़ने में सहायता करने के लिए मातृ भाषा और दूसरी भाषाओं को उचित महत्व दिया जाए।

भारत की उन्नत साक्षरता दर को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि अगले कुछ वर्षों में हमें अनिवार्य रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी आबादी पढ़, लिख, गणना, अभिव्यक्त कर सके तथा विकास संबंधी प्रक्रिया में अधिक आत्मविश्वास के साथ सहभागिता कर सके।

उपराष्ट्रपति ने विचार व्यक्त किया कि हमारी स्कूली प्रणाली को अनिवार्य रूप से अधिक शिशु हितैषी होनी चाहिए तथा उसे प्रत्येक शिशु के जन्मजात संकायों के समग्र विकास की दिशा में अग्रसर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी उच्चतर शिक्षा प्रणाली को अनुसंधान एवं शिक्षण में उत्कृष्टता पर अधिक जोर देने के लिए फिर से रूपरेखा बनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हम पर सामूहिक रूप से भविष्य को गढ़ने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें इसमें विफल नहीं होना चाहिए। उन्होंने हमारे देश की महान विरासत से प्रेरणा ग्रहण करने एवं इसे दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ विचारों एवं कदमों के साथ मिश्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज भारत एक ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था है और अगर हमें तेजी से बदलती इस दुनिया में प्रगति करनी है तो हमें एक औसत दर्जे की या गुणात्मक रूप से उप-इष्टतम शिक्षा प्रणाली से ऊपर उठना होगा। उन्होंने बड़ी संख्या में ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की उपस्थिति की इच्छा जताई जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केन्द्रित करें। उन्होंने कहा कि ‘दिमाग, हाथ और हृदय का एक साथ विकास होना चाहिए।’

उन्होंने विचार व्यक्त किया कि अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा हमें अज्ञानता, अंधविश्वास, कट्टरता, पूर्वाग्रहों एवं संकीर्ण दृष्टि से मुक्त करती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि बौद्धिक प्रतिभा को निश्चित रूप से अच्छे कार्यों एवं करूणापूर्ण व्यवहार से जुड़ा होना चाहिए। श्री सत्य साईं बाबा के उपदेशों ‘शिक्षा जीवन के लिए है न कि केवल आजीविका के लिए’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा को अनिवार्य रूप से ‘रुपान्तरकारी’ होना चाहिए न कि केवल ‘व्यावहारिक’। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए अनवरत प्रयास करने के लिए श्री सत्य साईं उच्च शिक्षा संस्थान की सराहना की।

इस अवसर पर श्री सत्य साईं उच्च शिक्षा संस्थान के कुलाधिपति श्री चक्रवर्ती, श्री सत्य साईं उच्च शिक्षा संस्थान कुलपति प्रो• के• बी• आर• वर्मा, श्री सत्य साईं ट्रस्ट के ट्रस्टी आर• एस• रत्नाकर एवं नागानंद तथा कई अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे।





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