स्क्रीन पर देवी, कसौटी पर कूटनीति



--के• विश्वदेव राव

महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता”, देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं। शक्ति केवल विनाश के लिए नहीं, संरक्षण, मार्गदर्शन और कल्याण के लिए भी होती है। नवरात्र के अवसर पर जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास ने अपना एआई अवतार “देवी” सार्वजनिक किया। राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने इसे नवरात्र और दुर्गा पूजा के संदर्भ में "अनुयायियों का मार्गदर्शन" करने वाला अवतार बताया। दूतावास की मंशा है कि यह अवतार भारत, कांसुलर सेवाओं, यात्रा, छात्रवृत्ति, व्यापार, निवेश और भारत-इंडोनेशिया साझेदारी से जुड़ी जानकारी को अधिक सुलभ बनाए।

इंडोनेशिया के जावा स्थित प्रम्बानन मंदिर में दुर्गा माँ, अर्थात् महिषासुरमर्दिनी, की नौवीं सदी की प्रतिमा है। इंडोनेशियाई लोक-स्मृति में उन्हें “लोरो जोंग्गरंग” कहा जाता है। वहाँ के कवियों ने रामायण को अपनी भाषा में रचा; जावा और बाली की सांस्कृतिक जीवनधारा में रामायण-महाभारत, संस्कृत शब्द और साझा पौराणिक प्रतीक आज भी जीवित हैं। भारत ने यह विरासत तलवार या तोप से नहीं, बल्कि शब्दों, कथाओं और व्यापारियों की नावों से पहुँचाई थी। अब उसी धरती पर 'देवी' लौटी है, इस बार पत्थर में नहीं, डिजिटल स्क्रीन पर।

नाम भी सोचा-समझा रखा गया है। "देवी" संस्कृत से निकलकर इंडोनेशियाई भाषा में पहुँचा शब्द है, जहाँ यह एक सामान्य और आदरणीय स्त्री-नाम है। इंडोनेशिया के राष्ट्रीय प्रतीक गरुड़ पंचशीला का आदर्श वाक्य “भिन्नेक तुंग्गल इका”, विविधता में एकता, भी संस्कृतनिष्ठ शब्दों से बना है। इसलिए "देवी" केवल एक कंप्यूटर (चैटबॉट) का नाम नहीं, सांस्कृतिक कूटनीति का संकेत है। यह नाम परिचित लगता है, दूरी घटाता है और भारत को केवल एक विदेशी राज्य नहीं, साझा सभ्यता वाला पड़ोसी प्रदर्शित करता है।

पर गौर करने की बात यह है कि यह "देवी" आशीर्वाद नहीं बाँटती। वह सूचना और सेवा का डिजिटल माध्यम है। देवी की परंपरागत छवि, करुणा, संरक्षण और ज्ञान को यहाँ एक सेवा-केंद्र में ढाला गया है।

यह प्रयोग अकेला नहीं है। भारतीय विदेश मंत्रालय की कूटनीति धीरे-धीरे स्क्रीन, सोशल मीडिया और एआई-आधारित सहायता की ओर बढ़ रही है। "म्यूनिख" जर्मनी में "सारथी", हंगरी में "भारती" और दुबई में प्रवासी सहायता से जुड़ी डिजिटल सेवाएँ इसके उदाहरण हैं। इसका अर्थ यह है कि कूटनीति अब केवल अहस्ताक्षरित राजनयिक पत्र, दौरों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह प्रवासियों की रोजमर्रा की जरूरतों और विदेशी नागरिकों की जिज्ञासा को भी संबोधित करना चाहता है।

इंडोनेशिया में लगभग 1.45 लाख भारतीय मूल के लोग और प्रवासी भारतीय रहते हैं। इनमें शिक्षक, इंजीनियर और लेखा-विशेषज्ञ जैसे पेशेवरों की संख्या काफी है। ऐसे समुदाय के लिए वीजा, पासपोर्ट, ओसीआई, छात्रवृत्ति या निवेश संबंधी जानकारी समय पर मिल जाना कोई छोटी सुविधा नहीं; यह विश्वास का विस्तार है। इंडोनेशिया के नागरिकों के लिए यह भारत का एक आत्मीय निमंत्रण भी है।

राजनयिक संस्थाएँ अब केवल "सूचना देने वाली" नहीं, "उपस्थित रहने वाली" संस्थाएँ बनना चाहती हैं। चौबीस घंटे उपलब्ध एआई-देवी इसी उपस्थिति का प्रतीक है। वह थकती नहीं, छुट्टी नहीं माँगती और आदर्श स्थिति में भाषा की दीवार से नहीं रुकती।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ऐआई को जिम्मेदार और मानव-केंद्रित तकनीक के रूप में देखने की बात कही है। उन्होंने इसे अब तक की जानी-पहचानी तकनीकों की "जननी" जैसा विशेषण दिया और नियमन, सुरक्षा-कवच तथा समावेशिता पर जोर दिया। भारत का प्रस्तावित दृष्टिकोण "मानव" नाम से जुड़ा है जो नैतिक प्रणालियाँ, जवाबदेह शासन, राष्ट्रीय संप्रभुता, सुलभ पहुँच और विश्वसनीय व्यवस्थाएँ है। संयुक्त राष्ट्र में इसे "एआई सबके लिए" रूप में रखा था।

यह सोच सराहनीय है। पर नीति का शब्दकोश और व्यवहार का हिसाब-किताब अक्सर अलग होते हैं। इतिहास सिखाता है कि प्रतीक आसानी से गढ़े जाते हैं, किंतु कठिनाई से निभाए जाते हैं।

प्रतीकों का उपयोग शक्ति के लिए भी होता है। माँ दुर्गा का स्वरुप केवल शक्ति नहीं, संरक्षण का दायित्व भी देती हैं। पर शक्ति का प्रयोग संरक्षण के लिए हो या दमन के लिए, यह प्रतीक तय नहीं करता; उसे इस्तेमाल करने वाली व्यवस्था तय करती है। "देवी" नाम की एआई भी इसी परीक्षा में है।

भारत जब यूपीआई और इंडिया स्टैक जैसी डिजिटल संरचना को वैश्विक सहयोग का उपकरण बताता है, तो सवाल उठता है कि क्या वह वाकई तकनीक साझा कर रहा है, या अपने प्रभाव-क्षेत्र का डिजिटल नक्शा खींच रहा है। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं। अगर कूटनीति सोच समझ कर की जाये।

फिलवक्त "देवी" का काम प्रशंसनीय लगता है। वह उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिनके लिए दूतावास तक पहुँचना कठिन है, जिनकी भाषा अलग है या जिन्हें साधारण जानकारी के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। डिजिटल कूटनीति यदि नागरिक की पहुँच बढ़ाए, तो वह लोकतंत्र के हित में है।

पर जब तकनीक नागरिक की सेवा में व्यवधान पैदा करने लगे, तब समस्या शुरू होती है। एआई जानकारी तेजी से दे सकता है, पर संदर्भ, संवेदना और नैतिक विवेक एक इंसान की तरह नहीं दे सकता। वीजा अस्वीकृति के बाद घबराया प्रवासी, विदेश में फँसा नागरिक या आपदा में मदद माँगता परिवार, इन सबके सामने चैटबॉट की सीमा किसी से छुपी नहीं है।

भारत की विदेश-नीति अब स्क्रीन की चमक से भी चलती है। "देवी" उस बदलाव का सुंदर, चतुर और सांस्कृतिक रूप से समझदार प्रयोग है। पर असली परीक्षा नाम में नहीं, व्यवहार में होगी। क्या यह देवी नागरिक की पहुँच बढ़ाएगी, या राजनयिक संदेश का प्रचार-माध्यम बनेगी? क्या वह प्रवासी की मदद करेगी, या उसकी शिकायत को सवालों के मकड़जाल में बदल देगी?

इस विषय पर ध्यान रखना होना अन्यथा "देवी" के नाम का यह डिजिटल अवतार भी, चेहरा दिव्य, सेवा यांत्रिक और सवाल अनुत्तरित की तरह हो जायेगा। पर मुझे उम्मीद है यह डिजिटल "देवी" केवल एक एआई अवतार नहीं, साझी विरासत का नया अध्याय होगी, जहाँ पत्थर की मूरत की श्रद्धा और डिजिटल देवी की सेवा, एक-दूसरे का हाथ थामे चलेंगी।

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