क्रिकेट पर सियासत



---के• विक्रम राव, अध्यक्ष - इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

पाकिस्तानी क्रिकेट प्रबंधन समिति में बौखलाहट दिख रही है। बदहवासी कहीं ज्यादा। मैनचेस्टर में खेले गये विश्वकप मैच में भारत के हाथों पराजय इसका कारण है। अब इस प्रभाव का सिलसिला उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद से जुड़ गया है। हारजीत पर जान कैनेडी ने कहा भी था कि विजय के कई जनक उपज आते हैं। विफलता अनाथ होती है। मगर विडम्बना है कि पूर्व क्रिकेटर और अब प्रधान मंत्री बने खान मोहम्मद इमरान खान ने अपनी ही टीम की निंदा की इब्तिदा कर दी। पाकिस्तान टीम का कप्तान सरफराज अहमद उन्हें रैलु कट्टु लगा। इस पाकिस्तानी लफ्ज का अर्थ है छुट्टा पाड़ा (बेकार का जीव)। अब चुनाचें वजीरे आजम जो खुद विजयी कप्तान रह चुके हैं, ने इस भद्दे मुहावरे का प्रयोग किया है तो यह तंज ज्यादा तिक्त तथा तीखा लगा। उधर समूचे पाकिस्तानी सोशल मीडिया में बौछार चल पड़ी। एक ने लिखा कि विराट कोहली रग-रग से कप्तान दिखते हैं। “हमारे सरफराज अहमद की सूरत से लगता है कि अजान से बस पाँच मिनट पहले ही सहरी के लिए उनकी नींद खुली हो।” उसे बेदिमाग कहा गया, तो यह भी कि वे मामू जैसा है। दर्जा दस का तालेबिल्म हो। पिज्जा निगल कर, दर्जनों गुलाब जामुन डकार कर, फूले पेट वाले इन खिलाडियों को अब सिर्फ पराठा ही परोसा जाय, लिखा छात्र नेता मोमिन साकिब ने। सारा पाकिस्तान भारत की शिकस्त हेतु मस्जिदों में मन्नत कर रहा था। सब बेकार हो गया। इधर इस सीरीज में पकिस्तान टीम की गत ऐसी हुई कि मानो नमाज माफ़ कराने गए, तो रोजे गले पड़ गए। ईद मनानी थी, मुहर्रम आन पड़ा। अब पाकिस्तान का नंबर टीमों की तालिका में नौवें पर है। विश्वकप तो अमावस का चाँद हो गया।

इस पूरे प्रकरण का आधार है पाकिस्तान क्रिकेट प्रबंधन समिति पर पंजाबी गुट का हावी हो जाना। शोएब मलिक, जो सियालकोट के हैं, ने कप्तान सरफराज को उखाड़ने की मुहिम चला दी है। हालांकि वे स्वयं पहली गेंद पर ही जीरो पर आउट हो गए थे। उनकी भारतीय बीवी (टेनिस की चैम्पियन) सानिया मिर्जा (तेलंगाना वाली) कहा करती है कि “मैं भारत की विजय चाहती हूँ, पर मेरे पति अधिक रन बनायें, यह भी चाहती हूँ।”

कप्तान–विरोधी इस पंजाबी खुर्रांट गुट को पठान प्रधान मंत्री का समर्थन है। अर्थात् सरफराज को भारत के विभाजन की त्रासदी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उनका ननिहाल इटावा में है। जहाँ से उनके पुरखे कराची जा कर बसे। गत रविवार, 16 जून को उनके मामू महबूब हसन अपने घर, इटावा में टीवी पर पाकिस्तान टीम की हार देखकर जश्न मना रहे थे। हालांकि उनका अपना कप्तान भांजा हारा है। अर्थात् भारत से गए मुसलमान जो कराची में बस गये हैं, आज भी दयनीय हैं, मोहाजिर कहलाते हैं, पाकिस्तानी नहीं माने जाते। वे इस पंजाबी-सिन्धी गुट से भिड़ते रहते हैं। अतः स्पष्ट है कि सरफराज को हटाने हेतु मैनचेस्टर में पूरी तैयारी की गई थी। तो सात दशकों पुराना इटावा का सिलसिला, फिर ताजा हो गया। वे भारतीय मुसलमान जो आज भी पाकिस्तान के प्रति हल्का-फुल्का प्यार पालते हैं, की आँखे सरफराज की दुर्गति देखकर पूरी तरह खुल जानी चाहिए। हिन्दू खिलाड़ी दानिश कनेरिया और इसाई यूसुफ योहाना को कलमा पढ़ना पड़ा ताकि वे पाकिस्तानी टीम में अपनी जगह बनाये रख सकें। आधे से अधिक पाकिस्तानी खिलाड़ी आजकल लम्बी लटकती दाढ़ी तथा सफाचट मूंछों के लिये मशहूर हो गए हैं। खेल दोयम हो गया। मजहब और सियासत के ऊपर।

इस समूचे वृत्तांत के सन्दर्भ में भारत-पाक के उस एक दिवसीय मैच का भी उल्लेख हो जाय जो 13 मई 2014 को कराची में खेला गया था। तब जीत के लिये पाकिस्तान को दस गेंदों पर मात्र आठ रन बनाने थे। तब यही शोएब मलिक (सानिया – पति) फुल फॉर्म में बल्ला चला रहे थे। मराठीभाषी जहीर खान ने गेंद फेंकी। शोएब मलिक ने छक्के के लिये ऊँची हिट मारी। तभी हमारा छोरा गंगा किनारे वाला (प्रयागराजवासी) मोहम्मद कैफ लम्बे फासले को लांघते दौड़ा और असंभव कैच लोक लिया। शोएब आउट हो गये। पाकिस्तानी जबड़े से उनकी जीत का निवाला भारतीय फील्डर ने छीन लिया। इस्लामी पाकिस्तान को भारतवासी जहीर और मोहम्मद कैफ ने शिकस्त दी, हिन्दुस्तान को जिता दिया।

इसी क्रम में ही याद कर लें एक ऐतिहासिक घटना को भी। भारत से गए मुसलमानों ने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना से (सितम्बर 1947) शिकायत की थी कि पाकिस्तान के समर्थन में केवल उन्हीं लोगों ने खूनी लड़ाई लड़ी थी। मगर नवसृजित राष्ट्र में बिना कुर्बानी दिये पंजाबी-सिन्धी-पठान वर्चस्व पा गये हैं। इस पर जिन्ना ने इन मोहजिरों को झिड़का था। कायदे-आजम बोले : “मुगालता मत पालो। पाकिस्तान की मांग ब्रिटेन से मनवाने में केवल तीन की ही भूमिका रही है : मेरी, मेरे निजी सहायक की और मेरे टाइपराइटर की।”





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