तो राहुल गाँधी बताएं कौन सा संवैधानिक पद उनके कुनबे ने छोड़ा था जिसकी रीढ़ नहीं तोड़ी गई?



---के• विक्रम राव, अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

अंततः राहुल हट गये। त्यागपत्र पर अड़े रहे। वर्ना सब स्वांग लगता। अमूमन हर इस्तीफे के साथ ढोंग ही होता रहा है। हालाँकि कांग्रेस की मनोनीत कार्यकारिणी के 18 में से 14 सदस्य लोकसभा चुनाव में ढेर हो गये थे। वे राहुल को अपने स्वार्थ में मना लेते। मामला घरेलू था।

अब संलग्न सवाल है कि खाली राहुल ही चुनावी पराजय के कारण सूली पर क्यों? संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन भी तो आकंठ डूबी है। इसके घटक भी तो हारे। तो उसकी अध्यक्ष सोनिया गाँधी फिर क्यों पदासीन रहें? आंच उनकी बेटी तक जायेगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश का कांग्रेसी महासचिव प्रियंका वाड्रा को नामित किया गया था। केवल दो ही सीटें 2014 में पाए थे। अब उनमें से मात्र एक ही (रायबरेली) जीती, अमेठी हारे। पुरखों की रूह व्यथित हुई होगी। अनुमान था कि अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के माध्यम द्वारा आसमान से अकस्मात् अवतरित हुई प्रियंका ढेर सारी सीटें समेट लेंगी। आँचल में वोट भर जायेंगे। मगर कुछ भी नहीं हुआ। तो पार्टी महामंत्री पद से प्रियंका को भी जाना चाहिए। अर्थात् माँ, बेटा और बेटी रुखसत हों। नए लोग आयें, दायित्व का सम्यक निर्वहन करें। अकेला बेचारा राहुल ही क्यों बकरा बने। लाभ उठाया इतने वर्ष पूरे खानदान ने। खामियाजा भी सब भुगतें।

लेकिन मसला ज्यादा संजीदा हो गया है। क्योंकि अपने चार पेज के अलविदा पत्र में पार्टी मुखिया ने मोदी सरकार पर गंभीर आरोप गढ़ा है कि राजग सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर और भ्रष्ट कर दिया है। जनविश्वास में दरार डाली है। भाजपायी प्रधानमन्त्री को भारत को जवाब देना चाहिए कि राहुल गाँधी की चार्जशीट कितनी सच है। प्रधान मंत्री को बचाव में सफाई तो देनी होगी। करोड़ों मतदाताओं कि आस्था से यह सब जुड़ा है। लेकिन राहुल गाँधी के आरोप से ज्यादा भयावह लांछन उनकी दादी इंदिरा गाँधी, उनके पिता जवाहरलाल नेहरू और इन पुरखों पर लगता है। राहुल को उनके पैदा होने के पूर्व किस संस्था और कानून की हत्या कब –कब हुई शायद उन्हें पता नहीं है। पढ़े होते तो वे जानते। न इतिहास बांचा, न भूगोल पढ़ा। अनजान तो रहेंगे ही।

मसलन निर्वाचन आयोग पर भ्रष्ट आचरण की बात राहुल और उनके वकील कपिल सिब्बल ने खुले आम कही। दोनों को याद दिला दूं कि तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन• गोपालस्वामी ने 31 जनवरी 2009 को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पदमुक्त करने का प्रस्ताव किया था। चावला पर आरोप था कि वे सोनिया कांग्रेस को आयोग की महत्वपूर्ण सूचनाएँ देते रहे। सोनिया गाँधी को भेंट में विदेशी सरकारों से मिले पारितोष और उपहार को छिपाने में सहायता की। मगर सरदार मनमोहन सिंह ने इस चार्जशीट को ख़ारिज कर दिया। नवीन चावला को प्रोन्नत कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त नामित किया। उन्होंने 2009 में 15वीं लोकसभा का चुनाव कराया, जिसमें कांग्रेस दुबारा जीत कर सत्ता में आई थी। आपातकाल के दौरान नवीन चावला संजय गाँधी के करीब थे। उन्होंने जामा मस्जिद के पास और तुर्कमान गेट पर मुस्लिम बस्तियों को उजाड़ा था। जबरन नसबंदी करायी थी।

अब राहुल क्या जाने 2009 में कितनी धांधली नवीन चावला ने करायी थी। वे तब सांसद थे। चावला तो सोनिया-कांग्रेस के अलमबरदार थे। अब और घृणास्पद बात पढ़िए। जवाहरलाल नेहरू के राज में मुख्य चुनाव आयुक्त थे सुकुमार सेन। इनके सगे भाई अशोक कुमार सेन कांग्रेस सरकार के कानून मंत्री थे। वे नेहरू और राजीव गाँधी के काबीना मंत्री रहे। उसी दौर में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति सुधीर रंजन दास के दामाद थे अशोक सेन। अर्थात राष्ट्र के तीनों उच्च संवैधानिक पद (कानून मंत्री, प्रधान न्यायाधीश और मुख्य निर्वाचन आयुक्त) पर तीन कौटुम्बिक जन एक साथ रहे। ये महापुरुष एक ही घर के थे।

राहुल कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र पर महाभियोग प्रस्तावित किया था। पूर्व में न्यायतंत्र को नपुंसक बनाने में उनकी दादी का कीर्तिमान रहा। न्यायमूर्ति ए• एन• राय को इंदिरा गाँधी ने 1973 में केवल दो घंटे में मुख्य न्यायाधीश नामित कर दिया। न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना तथा तीन वरिष्ठों को ख़ारिज कर एक कनिष्ठ जज ए• एन• राय को सर्वोच्च बनाया। इन्हीं के कार्यकाल में कानून बतलाया गया था कि आपातकाल में नागरिक की जान भी पुलिस ले सकती है। उनके बाद बने मो• हमीदुल्ल बेग जो कांग्रेस के बेजोड़ जी हुजूर थे।

चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और कानून मंत्रालय को घरेलू सेवक जैसा बनाकर नेहरू परिवार ने भारतीय सेना को भी बख्शा नहीं। चीन के हमले के समय (अक्टूबर 1962) नेहरू-कृष्णा मेनन (रक्षा मंत्री) ने जनरल बी• एम• कौल को जंगी मुकाबले का दायित्व दिया। ले• जनरल कौल को केवल रसद विभाग का ही अनुभव था, रण का नहीं। सेनाध्यक्ष बने जनरल प्राणनाथ थापर जो युद्ध के समय अचानक बीमार पड़ गये। चीन ने भारतीय सेना को बुरी तरह खदेड़ा। योग्य जनरलों को काट देने का यह अंजाम था। रायबरेली से चुनाव हारने के बाद (23 मार्च 1977), इंदिरा गाँधी ने सेनाध्यक्ष जनरल तपेश्वरनाथ रैना को सलाह हेतु बुलवाया था। तब यह खबर बहुत गर्म थी। रैना कश्मीरी थे।

अब जरा देश के सर्वोच्च पद का उल्लेख हो जाय। राष्ट्रपति को इंदिरा गाँधी ने घरेलू दास बना डाला था। सरदार ज्ञानी जैल सिंह ने कहा भी था कि यदि इंदिरा गाँधी कहेंगी तो वे झाड़ू भी लगा देंगे। आधी रात को 70-वर्षीय बुड्ढे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इंदिरा गाँधी ने जबरन दस्तखत कराकर भारत पर आपातकाल (25 जून 1975) थोप दिया। राष्ट्रपति चपरासी हो गया। सोनिया गाँधी ने प्रधान मंत्री की शपथ (अप्रैल 1999) दिलाने के लिए राष्ट्रपति के• आर• नारायणन को विवश कर दिया था। झूंठी लिस्ट जमा कर दी थी कि 272 सांसदों का समर्थन है। राहुल की नानी और अन्य इतालवी रिश्तेदार रोम से दिल्ली आ गये थे। तभी देश का भला हुआ। मुलायमसिंह यादव ने राष्ट्रपति को लिखा कि उनकी समाजवादी पार्टी का समर्थन सोनिया गाँधी को नहीं है। बहुमत नहीं हो पाया। विवश हो कर राष्ट्रपति नारायणन को लोकसभा भंग करनी पड़ी। अटल बिहारी वाजपेयी फिर चुनकर प्रधान मंत्री बने।

तो राहुल गाँधी बताएं कौन सा संवैधानिक पद उनके कुनबे ने छोड़ा था जिसकी रीढ़ नहीं तोड़ी गई? भारतीय मतदाताओं को नेहरू-परिवार का दास बनना अब गवारा नहीं है।





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