21 जून योग दिवस



--परमानंद पांडेय,
अध्यक्ष - अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास,
राष्ट्रीय संयोजक - मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच, उत्तर भारत।

■ अनुलोम-विलोम प्राणायाम

अनुलोम का अर्थ होता है सीधा और विलोम का अर्थ है उल्टा। यहां पर सीधा का अर्थ है नासिका या नाक का दाहिना छिद्र और उल्टा का अर्थ है-नाक का बायां छिद्र। अर्थात अनुलोम-विलोम प्राणायाम में नाक के दाएं छिद्र से सांस खींचते हैं, तो बायीं नाक के छिद्र से सांस बाहर निकालते है। इसी तरह यदि नाक के बाएं छिद्र से सांस खींचते है, तो नाक के दाहिने छिद्र से सांस को बाहर निकालते है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम को कुछ योगीगण 'नाड़ी शोधक प्राणायाम' भी कहते है। उनके अनुसार इसके नियमित अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियों का शोधन होता है यानी वे स्वच्छ व निरोग बनी रहती है। इस प्राणायाम के अभ्यासी को वृद्धावस्था में भी गठिया, जोड़ों का दर्द व सूजन आदि शिकायतें नहीं होतीं।

● विधि

अपनी सुविधानुसार पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन अथवा सुखासन में बैठ जाएं। दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से 4 तक की गिनती में सांस को भरे और फिर बायीं नासिका को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद कर दें। तत्पश्चात दाहिनी नासिका से अंगूठे को हटा दें और दायीं नासिका से सांस को बाहर निकालें।

अब दायीं नासिका से ही सांस को 4 की गिनती तक भरे और दायीं नाक को बंद करके बायीं नासिका खोलकर सांस को 8 की गिनती में बाहर निकालें।

इस प्राणायाम को 5 से 15 मिनट तक कर सकते है।

● लाभ

• फेफड़े शक्तिशाली होते है।

• सर्दी, जुकाम व दमा की शिकायतों से काफी हद तक बचाव होता है।

• हृदय बलवान होता है।

• गठिया के लिए फायदेमंद है।

• मांसपेशियों की प्रणाली में सुधार करता है।

• पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है।

• तनाव और चिंता को कम करता है।

• पूरे शरीर में शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है।

● सावधानियाँ

कमजोर और एनीमिया से पीड़ित रोगी इस प्राणायाम के दौरान सांस भरने और सांस निकालने (रेचक) की गिनती को क्रमश: चार-चार ही रखें। अर्थात चार गिनती में सांस का भरना तो चार गिनती में ही सांस को बाहर निकालना है।

स्वस्थ रोगी धीरे-धीरे यथाशक्ति पूरक-रेचक की संख्या बढ़ा सकते है।

कुछ लोग समयाभाव के कारण सांस भरने और सांस निकालने का अनुपात 1:2 नहीं रखते। वे बहुत तेजी से और जल्दी-जल्दी सांस भरते और निकालते है। इससे वातावरण में व्याप्त धूल, धुआं, जीवाणु और वायरस, सांस नली में पहुंचकर अनेक प्रकार के संक्रमण को पैदा कर सकते है।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते समय यदि नासिका के सामने आटे जैसी महीन वस्तु रख दी जाए, तो पूरक व रेचक करते समय वह न अंदर जाए और न अपने स्थान से उड़े। अर्थात सांस की गति इतनी सहज होनी चाहिए कि इस प्राणायाम को करते समय स्वयं को भी आवाज न सुनायी पड़े।

● फायदे

• हमारे शरीर की 72, 72, 10, 210 सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाड़ी शुद्ध हो जाती है।

• हार्ट की ब्लाँकेज खुल जाते है।

• हाय व लो दोनों रक्त चाप ठिक हो जायेंगे।

• आर्थराटीस, रोमेटोर आर्थराटीस, कार्टीलेज घीसना ऐसी बीमारीओंको ठीक हो जाती है।

• टेढे लीगामेंटस सीधे हो जायेंगे।

• व्हेरीकोज व्हेनस ठीक हो जाती है।

• कोलेस्टाँल, टाँक्सीनस, आँस्कीडण्टस इसके जैसे विजतीय पदार्थ शरीर के बहार नीकल जाते है।

• सायकीक पेशनट्स को फायदा होता है।

• कीडनी नेचरली स्वच्छ होती है, डायलेसीस करने की जरुरत नहीं पड़ती।

• सबसे बड़ी खतरनाक बीमारी केन्सर तक ठीक हो जाता है।

• मेमरी बढ़ाने के लिए।

• सर्दी, खाँसी, नाक, गला ठीक हो जाता है।

• ब्रेन ट्युमर भी ठीक हो जाता है।

• सभी प्रकार के चर्म समस्या मिट जाती है।

• मस्तिषक के सम्बधित सभी व्याधियों को मिटाने के लिये।

• पर्किनसन, प्यारालेसिस, लुलापन इत्यादी स्नायुओ के सम्बंधित सभी व्याधियों को मिटाने के लिये।

• सायनस की व्याधि मिट जाती है।

• डायबीटीस पुरी तरह मिट जाती है।

• टाँन्सीलस की व्याधि मिट जाती है।

• ठण्डी और गरम हवा के उपयोग से हमारे शरीर का तापमान संतुलित रहता है।

• इससे हमारी रोग-प्रतिकारक शक्ती बढ़ जाती है।

• दमा का रोग जड़ से चला जाता है।

• अनुलोम विलोम के करने से कोई भी एलर्जी जड़ से खत्म हो जाती है।

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