--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■एसआईटी जांच से भोपाल की राजनीति में हलचल, महापौर मालती राय से जुड़े आरोपों ने बढ़ाई सियासी बेचैनी
■जांच के घेरे में जनप्रतिनिधि, असलम कुरैशी मामले ने उजागर किए सत्ता–संरक्षण के सवाल
गौवंश हत्या से जुड़े एक मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) की सक्रियता के बाद राजधानी भोपाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस पूरे प्रकरण में आरोपी असलम कुरैशी के एसआईटी की हिरासत में जाने के बाद अब जांच का दायरा बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस जांच के दौरान कई प्रभावशाली नाम सामने आ सकते हैं, जिनमें जनप्रतिनिधियों और रसूखदार लोगों के शामिल होने की आशंका जताई जा रही है। मामले को लेकर सबसे अधिक चर्चा भोपाल की महापौर मालती राय को लेकर हो रही है। विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि गौवंश से जुड़े इस अवैध नेटवर्क में नगर निगम स्तर पर संरक्षण दिया गया और कथित रूप से आर्थिक लेन-देन भी हुआ। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी जांच एजेंसियों की ओर से नहीं की गई है।
● आरोपों के केंद्र में महापौर, जांच एजेंसियों की निगाहें दस्तावेजों पर
सूत्रों के अनुसार, एसआईटी अब उन फाइलों, अनुमतियों और निगम से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है, जिनके माध्यम से आरोपी गतिविधियों को कथित रूप से संरक्षण मिला। यह भी देखा जा रहा है कि किन परिस्थितियों में संबंधित कार्यों को अनुमति दी गई और किस स्तर पर निर्णय लिए गए। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या नगर निगम के स्तर पर सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या फिर नियमों की अनदेखी हुई। महापौर मालती राय को लेकर लगाए जा रहे आरोपों में यह भी कहा जा रहा है कि बिना उच्च स्तरीय राजनीतिक सहमति के महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं होते। इन दावों के बीच जांच एजेंसियां फिलहाल तथ्यों और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ने की बात कह रही हैं।
● कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग का नाम आने से बढ़ी सियासी तपिश
इस पूरे मामले में कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग का नाम सामने आने के बाद राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि नगर निगम से जुड़े कई फैसलों में मंत्री स्तर की सहमति अहम भूमिका निभाती है। वहीं, भाजपा की ओर से अब तक इस संबंध में कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी जांच एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगी और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर निर्णय लिया जाएगा। दूसरी ओर विपक्ष इस मामले को “नैतिकता और जवाबदेही” से जोड़ते हुए सरकार पर दबाव बना रहा है।
● गौवंश हत्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति तेज
गौवंश से जुड़ा मामला होने के कारण यह प्रकरण केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक मुद्दा भी बन गया है। कई हिंदू संगठनों और सामाजिक समूहों ने इस पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि सामाजिक विश्वास के साथ भी धोखा होगा। इसी बीच सवाल यह भी उठ रहे हैं कि खुद को गौ-संरक्षण का समर्थक बताने वाली सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अब तक इस मामले में कोई सार्वजनिक रूप से बड़ा बयान या कार्रवाई क्यों नहीं की। हालांकि, सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
● जांच का दायरा बढ़ने के संकेत, पुराने मामलों की भी हो सकती है पड़ताल
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, एसआईटी केवल वर्तमान मामले तक सीमित नहीं रह सकती। चर्चा है कि पूर्व में सामने आए कुछ अन्य आपराधिक नेटवर्क, जिनमें ड्रग्स सप्लाई और अवैध गतिविधियों के आरोप लगे थे, उनकी कड़ियों को भी खंगाला जा सकता है। हालांकि, जांच एजेंसियों ने इस बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है।
● विपक्ष का हमला, भाजपा की छवि पर असर का दावा
विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण को लेकर भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि यदि जांच में सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं के नाम सामने आते हैं, तो यह भाजपा और मध्यप्रदेश सरकार की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचा सकता है। विपक्ष ने मुख्यमंत्री से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने की मांग की है।
● भाजपा का रुख: जांच पूरी होने दें
भाजपा के अंदरखाने से मिल रही जानकारी के अनुसार, पार्टी नेतृत्व फिलहाल “वेट एंड वॉच” की नीति पर है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कानून अपना काम करेगा और किसी को भी बचाने या फंसाने की राजनीति नहीं होनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि जांच पूरी होने के बाद ही किसी तरह की राजनीतिक या संगठनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
● राजनीतिक भविष्य पर असर की अटकलें
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच लंबी चलती है और नए नाम सामने आते हैं, तो इसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। राजधानी भोपाल की राजनीति में यह मामला आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बन सकता है। फिलहाल यह पूरा मामला जांच के अधीन है। आरोप, प्रत्यारोप और राजनीतिक बयानबाजी के बीच सच क्या है, यह एसआईटी की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस प्रकरण ने मध्यप्रदेश की राजनीति में बेचैनी बढ़ा दी है और आने वाले दिनों में इस पर सियासी घमासान और तेज हो सकता है।