भेदभाव वाले यूजीसी कानून पर 'सुप्रीम' रोक



--राजीव रंजन नाग
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि फिलहाल यूजीसी का 2012 का रेगुलेशन ही जारी रहेगा।

मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों से कई तीखे सवाल भी पूछे। सीजेआई ने पूछा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके है और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं?

टॉप कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलाइंस "अस्पष्ट" हैं और इनका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार और यूजीसी को औपचारिक नोटिस जारी करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये विवादित नियम अगले आदेश तक रोक पर रहेंगे। टॉप कोर्ट ने कहा कि 2012 की गाइडलाइंस, जो सलाहकारी प्रकृति की थीं, जारी रहेंगी।

इस महीने की शुरुआत में, यूजीसी ने नए नियमों को नोटिफाई किया था, जिसमें सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भेदभाव की शिकायतों को देखने और समावेश को बढ़ावा देने के लिए इक्विटी कमेटियां बनाना अनिवार्य कर दिया गया था। इन नियमों के अनुसार, कमेटियों में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग व्यक्तियों और महिलाओं के सदस्य शामिल होने चाहिए।

इन नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत सामान्य श्रेणी के छात्र यूजीसी के शिकायत निवारण तंत्र के तहत शिकायत दर्ज करा सकें, जिससे कई विश्वविद्यालयों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हस्तक्षेप ज़रूरी था क्योंकि यूजीसी की गाइडलाइंस "समाज को बांटने में सक्षम" थीं। टॉप कोर्ट ने कहा कि 2012 की गाइडलाइंस, जो सलाहकारी प्रकृति की थीं, जारी रहेंगी।

चीफ जस्टिस ने कहा, "अगर हम हस्तक्षेप नहीं करते हैं, तो इसका खतरनाक असर होगा, समाज बंट जाएगा और इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।" उन्होंने आगे कहा, "पहली नज़र में, हम कहते हैं कि नियम की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है ताकि भाषा को इस तरह से ढाला जाए कि इसका दुरुपयोग न हो।" मुख्य नयायाधीश ने पूछा - अगर दक्षिण भारत के किसी छात्र को उत्तर भारत के विश्विद्यालय में एडमिशन मिलता है, उस पर टिप्पणी होती है तो क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा? इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इसके लिए अलग से प्रावधान है किसी के जन्मस्थान के आधार पर अगर भेदभाव होता है तो उस पर एक्शन लिया जा सकता है।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ये नियम प्रकृति में बहिष्करण वाले हैं और एससी, एसटी, या ओबीसी श्रेणियों से बाहर के लोगों को संस्थागत सुरक्षा से वंचित करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह का चयनात्मक ढांचा गैर-आरक्षित श्रेणियों के छात्रों के प्रति दुश्मनी पैदा करेगा। उन्होंने आगे कहा कि "सभी नागरिकों को संरक्षित किया जाना चाहिए।" इसे "संविधान का मूल जनादेश" बताते हुए यूजीसी ने ये नियम 2019 में सुप्रीम कोर्ट में राधिका वेमुला और अबेदा सलीम तडवी, जो क्रमशः रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताएं हैं, द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब में बनाए थे।

बताया जाता है कि दोनों छात्रों ने अपने विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। याचिका में कैंपस में जातिगत भेदभाव को दूर करने और खत्म करने के लिए एक तंत्र बनाने की मांग की गई थी।

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