संघ बीजेपी का निष्ठुर, निर्दई अमानवीय दर्शन



--आचार्य श्रीहरि
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

●मौन प्रहरियों,समर्थकों, बलिदानियों के संकट, संहार के समय संघ बीजेपी की बर्बर व निंदनीय मानसिकता

संघ और बीजेपी के संबंध में आम धारणा यह है कि इनके नेता प्रचारक बहुत ही निष्ठुर, निर्दई, अमानवीय और रंगबदलू होते है। इस पर मेरी समझ भी कुछ इसी तरह की थी, फिर भी मेरी अलग एक यह समझ थी कि बीजेपी और संघ के लोग देशभक्त हैं, सनातन की विरासत के प्रति समर्पित हैं। यही कारण है कि इनकी निष्ठूरता निर्दई, अमानवीय और रंगबदलू चेहरे को मेरे जैसे लाखों लोग नजरंदाज कर इनके प्रति सहानुभूति रखते हैं। लेकिन कुछ उदाहरण इनके प्रति घृणा प्रदर्शित करने के लिए बाध्य करते हैं, विवश करते हैं और विद्रोही बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

मैं स्वयं को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। अभी अभी मेरे पूज्य पिताजी (मुनी साव) इस दुनियां को छोड़ कर पंच तत्व में विलीन हो गए। मेरे पिता स्वर्गीय मुनी साव जी की विशेषता और कर्म महान, बेमिसाल थे और अद्भुत प्रेरक थे। ये जनसंघ और बीजेपी के मौन प्रहरी थे, अपने कर्म क्षेत्र में जनसंघ को स्थापित और प्रचारित करने में इनकी भूमिका अग्रणीय थी। वे जनसंघ के प्रारंभिक दौर के मौन प्रहरी थे। वह दौर कांग्रेस के वर्चस्व का था। जनसंघ का नाम सुनते ही लोग मारने के लिए टूट पड़ते थे, बर्बाद और संहार करने के लिए टूट पड़ते थे, उस दौर में जिन लोगों ने भी जनसंघ को स्थापित करने के लिए अपना परम योगदार दिया और अपनी भूमिका निभाई वे निश्चित रूप से वीर थे, निडर थे, महान थे।

मेरे पिता जी चूंकि एक सफल व्यवसायी थे, वैश्य वर्ग से आते थे, इसलिए उनकी सहानुभूति और समर्पण राष्ट्र और सनातन के प्रति जन्मजात थी। भामाशाह नहीं होते तो फिर महाराणा प्रताप महान नहीं होते। बजाज और बिड़ला परिवार सहित पूरे वैश्य वर्ग का धन नहीं मिला होता तो फिर महात्मा गांधी महान नहीं होते, उनके आश्रम के लिए भोजन पानी कहा से आता, उनकी बकरियों को खाने के लिए काजू किशमिश कहा से आती। संघ बीजेपी को जिंदा रखने के लिए धन और समर्थन कहा से आता। मेरे पिता स्वर्गीय मुनी साव जी भी गुप्त दान संघ बीजेपी के लिए किया करते थे। मै खुद भी अपना जीवन संघ और बीजेपी के लिए बलिदान कर दिया, मै संघ का प्रचारक नहीं हूं फिर भी एक प्रचारक से कही बड़ी भूमिका और योगदान मेरा है। मैने बीजेपी संघ से कुछ लिया नहीं बल्कि कुछ दिया ही है। मै ब्रम्हचर्य हूं और सन्याशी भी हूँ।

क्षोभ और विछोह का विषय यह है कि मेरे पिता जी के निधन पर बीजेपी, संघ के लोगों ने शोक संदेश भी नहीं दिया, दाह संस्कार और ब्रह्मभोज में आए भी नहीं, श्रद्धांजलि सभा में भी संघ बीजेपी से जुड़े लोगों ने आने की परंपरागत भूमिका निभाई नहीं। जबकि विधिवत और परम्परागत ढंग से उन्हें सभी जानकारियां उपलब्ध कराई गई थी। स्थानीय स्तर के सभी बीजेपी और संघ से जुड़े लोग अनभिज्ञ बने रहे। ऐसा सिर्फ मेरे पिता जी के साथ नहीं हुआ है बल्कि मेरे जैसे लाखों लोगों के साथ घटना घटी है, संकट और संहार की स्थित में अपने समर्थक और महान कार्यकर्ताओं और संघ बीजेपी के लिए लड़ने वाले लोगों को बीजेपी और संघ के लोग मदद करने की बात तो दूर है बल्कि सहानुभूति भी प्रकट नहीं करते हैं।

इसके विपरीत प्रेरक, सुखद स्थिति भी देखिए। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी, जेएमएम सहित विरोधी विचार धारा के लोगो ने न केवल शोक संदेश दिया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी सहानुभूति दिखाई, ब्रह्मभोज और श्रद्धांजलि सभा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, मुझे इस दुख की घड़ी से निकलने के लिए साहस भी दिया। यह सब जानते हुए भी कि मेरे पिता जी जनसंघ के मौन प्रहरी थे और खुद मै भी बीजेपी और संघ के लिए बलिदानी प्रहरी हूँ, फिर भी कांग्रेस, कम्युनिस्ट समाजवादी जेएमएम सहित अन्य विचार धारा के लोग मेरे पिता जी के प्रति स्नेह और सहानुभूति जो प्रकट किया वह मेरे लिए महान बेमिसाल विरासत है।

सत्ता सुंदरी मद में मदहोश बीजेपी और संघ के लोग अपनी जड़ को भूल गए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी, मोदी ही महान नहीं हैं, ये सभी अपनी भूमिका की बड़ी कीमत वसूल चुके हैं। सत्ता सुंदरी के उपभोग में पागल ये समझने के लिए तैयार नहीं है कि हजारों, लाखों मौन प्रहरियों, अनभिज्ञ, गुमनाम सेनानियों के बलिदान का प्रतीक मोदी सरकार है, बीजेपी और संघ का संगठन है। प्रेरक, महान तो संघ बीजेपी के लिए लड़ने वाले मौन प्रहरियों, मौन, गुमनाम सेनानियों को समझा जाना चाहिए जो अपनी जान, धन समर्पित कर गए, जिन्होंने बीजेपी और संघ से कुछ लिया नहीं बल्कि कुछ दिया ही है। अयोध्या में मुलायम सिंह यादव को गोलियां चला कर राम कार सेवकों की हत्या करने का सुझाव और पुलिस को गोलियां चलाने का आदेश देने वाले नृपेन मिश्रा रातों रात महान बन गए, राममंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष बन कर सत्ता सुख भोग रहे हैं पर कोठारी बंधुओं के बलिदान को उचित सम्मान तक नहीं दिया गया, उनकी मूर्तियां भी लगवाने की जरूरत नहीं समझी गई, कोठारी बंधुओं सहित सैकड़ों बलिदानियों को क्या और कौन सा सम्मान मिला?

अब समझ बढ़ी है, कश्मीर देख चुके हैं, केरल, पश्चिम बंगाल देख रहे हैं। आदिवासी भी ईसाई बन कर आपके अस्तित्व पर कुठाराघात कर रहे हैं। 240 का प्रहार देख चुके हैं। आगे सत्ता संहार भी देखेंगे। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की खुशफहमी, सत्ता संहार भी एक आइकन है। यानी संघ बीजेपी आगे सत्ता नाश देख सकती है।

कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी जेएमएम सहित अन्य विचार धारा के लोगो का अपनी जड़ों के प्रति सहानुभूति समर्पण, अपने समर्थकों के प्रति मदद की प्रवृति हमें प्रेरणा देती हैं, आकर्षित करती है। मौन प्रहरियों, मौन समर्थकों, गुमनाम सेनानियों के प्रति सर झुकाने और उनके संकट के समय साथ खड़ा होना अनिवार्य है, यह सबको सिखना चाहिए। जब संघ बीजेपी के लोग अपने समर्थकों और बलिदानियों के दाह संस्कार, श्रद्धांजलि सभा में भी उपस्थिति दर्ज नहीं कराते हैं तब उनसे संकट, संहार की स्थिति में मदद और रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

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