--आशुतोष सिंह
वाराणसी-उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।
यूजीसी बिल लाने की क्या जरूरत आन पड़ी भाजपा को। क्या कमी थी? भाजपा में क्या वोटरों की कमी थी? वैसे तो चाहत का कोई अन्त नही...। अभी अभी पार्टी की बिहार में शानदार जीत हुई। खुशी अभी थमा नहीं.. बंगाल, आसाम, उत्तरप्रदेश, केरल पार्टी की जीत जिसे हम जैसे सामान्य कार्यकर्ता देख रहे थे, क्या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जीत की खुशबू नहीं महसूस कर रहा। भाजपा बंगाल जीत कर जनसंघ के संस्थापक स्व. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सही मायने में सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करती।
क्या भाजपा के सभी एजेंडे खत्म हो गए थे, कि यूसीजी जैसे प्राणघातक अस्त्र की जरूरत आन पड़ी। उसका प्रयोग भी कर दिए। निश्चय ही राम मन्दिर बन गया, 370 हट गया, तीन तलाक पर विराम लगा और यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सराहनीय कार्य किया। जितनी प्रशंसा की जाय कम है, तो यूसीजी बिल लाना कहा से उचित हैं। हिन्दुओं को आपस मे लड़ाने की साजिश तो नहीं...।
एक ओर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी हिन्दुओं को जोड़ने में व्यस्त है। बाटोगे तो काटोगे का आह्वान करते हैं। और यह सत्य है जिसका इतिहास साक्षी है "जब जब हिन्दू बंटे हैं तब तब कटे है, हिन्दुओं का विनाश हुआ है। तो यह सलाह पार्टी के किस सलाहकार ने दिया। क्या उस सलाहकार को भाजपा दल के डीएनए के बारे पता था नहीं...? मैं नि:संदेह कह सकता हूँ कि इसका परिणाम कितना घातक होगा।
सवर्ण भाजपा के कोर वोटर हैं। सवर्ण में क्षत्रिय, ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, वैश्य, बनिया जाति प्रमुख है। ब्राह्मण जो जन्म से लेकर श्राद्ध कर्म तक कराते है, तो क्या पार्टी का हश्र पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह जी जैसा होगा। क्या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस पर चितन से वंचित रह गया?
अभी-अभी नितिन नवीन पार्टी अध्यक्ष बने हैं। पार्टी ने सराहनीय निर्णय लिया। इस कारण भाजपा परिवार में सकारात्मक संदेश गया कि जब नितिन जी जैसा आम कार्यकर्ता पार्टी अध्यक्ष बन सकता तो हम भी एक दिन पार्टी में कुछ बन सकते हैं।
यूसीजी का फैसला जो पार्टी ने लिया है, इसके दो प्रमुख भागीदार होंगे - एक प्रधानमंत्री होने के नाते नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष होने के नाते नितिन नबीन। हम जैसे आम कार्यकर्ता तो यही सोचते हैं।
कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी राजकीय कार्यो में व्यस्त होने के कारण संगठन के फैसलों में ध्यान कम दे रहे हैं। जहाँ तक मेरा मानना है कि मोदी जी ने बहुत ही नजदीक से पार्टी का अध्ययन किया हैं, उनके गुरु अटल जी ने कहा था, "बादल हटेंगे, सूरज निकलेगा" ...और पार्टी का सूर्योदय शानदार हुआ। अभी तो सूरज भरी दोपहरी में था, कि यूसीजी नाम का ग्रहण उसे ढकने पर आमादा हैं।
यह सारी बातें हम जैसे आम कार्यकर्ता के मन मे आ रहे है जो बचपन में जनसंघ का झण्डा उठाये आज तन मन से भाजपा के साथ हैं। हम जैसे कितने लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक से तैयार हो भाजपा के साथ जुड़े हैं, क्या है हमारे मन की बात में...।
मैं काशी का हूँ। मैंने विश्वनाथ प्रताप सिंह को सम्मानित होते इसी काशी में देखा हैं। जब नारा लगा, "राजा नही फकीर हैं देश की तकदीर हैं"। और इसी काशी ने उन्हें अपमानित किया, नारा लगा, "राजा नहीं रंक हैं देश का कलंक है"। नितिन जी ने यह फैसला लेते वक्त विचार किया कि मोदी जी काशी की जनता के सामने क्या जवाब देंगे? कितनी दुविधा की स्थिति होगी मोदी जी के लिए, जिस काशी से वो सांसद है उसके ज्यादातर मतदाता सवर्ण हैं। नितिन जी ने इतना बड़ा फैसला अकेले लिया और परिणाम पूरे पार्टी को भुगतना पड़ेगा। क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान व्यर्थ हो जाएगा, अगर यह फैसला अध्यक्ष होने के नाते नितिन जी ने लिया है तो...। एक देशी कहावत हैं - "लड़का ठाकुर, बूढ़े दीवान और खेती बिगड़े साझ विहान।
सवर्ण कुल में जन्मे हैं। यही कह सकते हैं - "अधिकार खोकर बैठे रहना यह महादुष्कर्म है, इस तथ्य पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ जो भव्य भारत वर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ। एक सवर्ण आम कार्यकर्त्ता होने के नाते पार्टी से कोई उपेक्षा न कभी रही हैं न कभी होगी। केवल सम्मान का भूखा था, पार्टी जब वह नहीं दे सकती... तो मेरी पार्टी को हार्दिक शुभकामनाएं।