--प्रमोद दूबे
संपादक - कपिला प्रहरी
कोलकाता - पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज।
●चाचा यह बफे सिस्टम था, भोजन नहीं किए तब, हम क्या करें, पानी पी लीजिए!
बात पिछले साल गर्मियों की है। उत्तर प्रदेश के बनारस के एक आलीशान मैरिज लॉन में शादी का रिसेप्शन चल रहा था। डीजे का शोर इतना तेज था कि पास खड़े व्यक्ति की बात सुनना भी मुश्किल था। एक कोने में सजी-धजी कुर्सियों पर 75 वर्षीय घुरहू चाचा चुपचाप बैठे थे। उनकी आँखों में थकान थी और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता।
तभी उनका पोता, 18 साल का संतोष, हाथ में एक चमचमाती प्लेट लिए उनके पास आया। प्लेट में पनीर, चाऊमीन और न जाने क्या-क्या भरा हुआ था। "दादू! आप यहाँ अकेले क्यों बैठे हैं? चलिए न, कुछ खा लीजिए। 'बफे' लगा है, बहुत टेस्टी खाना है," संतोंष ने उत्साह से कहा।
घुरहू चाचा ने पोते की प्लेट की ओर देखा, फिर भीड़ की ओर, जहाँ लोग खड़े-खड़े, धक्का-मुक्की करते हुए अपनी प्लेटों में खाना भर रहे थे। उन्होंने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, तुम खा लो। मुझे भूख नहीं है।" "अरे दादू, भूख कैसे नहीं है? शादी में आए हैं, खाना तो पड़ेगा," संतोष ने जिद की। घूरहू चाचा ने गहरी सांस ली और पास पड़ी खाली कुर्सी पर हाथ रखकर संतोष को बैठने का इशारा किया।
"आर्यन," चाचा की आवाज थोड़ी भारी थी, "इसे तुम खाना कहते हो? यह तो दौड़ है। प्लेट लेकर लाइन में लगना, फिर मांग कर खाना... हमारे जमाने में इसे भोजन नहीं, 'भिक्षा' जैसा महसूस किया जाता था।" संतोष चौंक गया। "भिक्षा? दादू, यह मॉडर्न तरीका है। सेल्फ सर्विस।" चाचा की आँखों में चमक आ गई, जैसे वो अस्सी के दशक के किसी गलियारे में पहुँच गए हों।
"बेटा, मॉडर्न तो अब हुआ है सब। पर तुमने वो 'अपनापन' नहीं देखा जो हमने जिया है। अस्सी का दशक... तुम्हें पता है, जब तुम्हारी बुआ की शादी हुई थी, तो हमारे पास कोई इवेंट मैनेजर नहीं था। हमारा मैनेजर था 'पूरा गाँव'।" संतोष उत्सुकता से सुनने लगा। बाल खुजलाते हुए चाचा ने बताना शुरू किया, "शादी की तारीख तय होते ही, पूरे गाँव में खबर बिजली की तरह नहीं, बल्कि 'जिम्मेदारी' की तरह फैलती थी। हमारे घर में इतने बिस्तर नहीं थे कि बारात को सुला सकें। लेकिन हमें चिंता नहीं थी। शाम होते-होते गाँव के हर घर से एक चारपाई, एक रजाई और एक तोशक हमारे दरवाजे पर आ जाता था। कोई यह नहीं सोचता था कि मेरा बिस्तर जा रहा है, सब यही कहते थे - 'बिटिया की शादी है, इज्जत गाँव की है'।"
"सच में दादू? लोग अपना सामान दे देते थे?" संतोष ने अचरज से पूछा। "सामान ही नहीं, बेटा, श्रम भी," चाचा हंसे, "हलवाई तो बस सब्जी और मिठाई के लिए भाड़े पर आता था। बाकी काम? अरे, गाँव की औरतों का झुंड का झुंड आता था। हर काकी, ताई, बहन, बेटी, भाभी अपने घर से अपना 'चौकी-बेलन' लेकर आती थीं। आँगन में बैठकर जब वो गीत गाते हुए पूरी-कचौड़ी बेलती थीं न, तो उस खाने में घी से ज्यादा 'स्नेह' का स्वाद होता था। वो मशीनें नहीं थीं, वो परिवार था।"
घुरहू चाचा की आवाज़ में एक कसक थी। "और द्वारपूजा... आज तुम बाउंसर खड़े करते हो। तब द्वारपूजा में गाँव के बुजुर्ग और जवान लाठी लेकर नहीं, फूल लेकर खड़े होते थे, लेकिन उनकी एकजुटता ऐसी होती थी कि सामने वाला समझ जाता था कि इस घर की बेटी अकेली नहीं, पूरा गाँव उसके पीछे खड़ा है।"
संतोष ने अपनी प्लेट नीचे रख दी। डीजे का शोर अब उसे भी चुभने लगा था। किसान चाचा ने आसमान की ओर देखा, "और जानते हो सबसे बड़ी बात? दुख में भी हम अकेले नहीं थे। अगर गाँव में किसी की मृत्यु हो जाती, तो जब तक दाह-संस्कार करके लोग गंगा किनारे से वापस नहीं आते, किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता था। शव जलाने के बाद पूरा गाँव एक साथ लौटता था। वो कच्ची सड़कें थीं, रास्ते लोगों के दरवाजों और आंगनों के बीच से होकर गुजरते थे। कोई दीवार नहीं थी, न दिलों में, न मकानों में।"
फिर चाचा ने संतोष की प्लेट की ओर इशारा किया, "आज सब पक्का हो गया है बेटा। मकान भी, सड़कें भी। बस रिश्ते कच्चे हो गए हैं। यह जो 'बफे सिस्टम' है न, इसने भाईचारा निगल लिया। अब 'पंगत' में बैठकर कोई आग्रह नहीं करता - 'अरे भाई साहब, एक पूरी और लीजिए'। अब तो 'अपना लो, अपना खाओ और चलते बनो'। आदमी ही आदमी से कट गया है। बाजार गाँव में घुस आया है, और इंसानियत बाहर निकल गई है।"
संतोष कुछ देर चुप रहा। उसने चारों ओर देखा। लोग अपने मोबाइलों में व्यस्त थे, कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सब खा रहे थे, पर 'खिला' कोई नहीं रहा था। उसने धीरे से चाचा का हाथ थामा और कहा, "दादू, मैं वो अस्सी का दशक तो वापस नहीं ला सकता। लेकिन... चलिए, आज मैं आपको अपने हाथों से खाना परोस कर खिलाऊंगा। हम कुर्सी पर बैठकर खाएंगे, लाइन में नहीं लगेंगे।"
घुरहू चाचा की आँखों में पानी तैर गया। उन्होंने पोते के सिर पर हाथ फेरा। शायद गाँव पूरी तरह नहीं मरा था, संस्कार की एक चिंगारी अभी भी राख के नीचे दबी थी।
जागिए, मेरे गांव वालों!