गले मिले चारों भाई, हर आंख डबडबाई



वाराणसी,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।

● अयोध्या पहुंचने पर भावविह्वल होकर भाई भरत व शत्रुघ्न से गले मिलने के लिये दौड़ पड़े श्रीराम व लक्ष्मण, गले मिलते ही नाटीईमली का ऐतिहासिक मैदान श्रीराम के जयकारे से गूंज उठा

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धर्म की राजधानी काशी सदियों से परंपराओं की पोषकता के साथ उद्भव स्थली के रुप में भी ख्यातिलब्ध रही है। विश्व का अनूठा नाटक, सबसे बडी, सबसे अल्पकालिक लीला भरत-मिलाप का होता है। लाखों श्रद्धालुओं मात्र पांच मिनट की होती है।

काशी बुधवार को त्रेता में पहुंचने का अहसास पाई। आस्था के भावों से सहज ही वह ठांव तब उभर आया, जब 14 वर्ष के वनवास बाद प्रभु श्रीराम अवध पहुंच भाई भरत को गले लगाए। विजया दशमी के दूसरे दिन नाटी इमली इलाके में गोधूलि बेला में सूर्यास्त के पहले होने वाला विश्व विख्यात ‘भरत मिलाप’ का मंचन बुधवार की शाम किया गया। 476 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन हुआ।

काशी के लक्खा मेलें में शुमार नाटी इमली का भरत मिलाप के पांच मिनट के इस लीला को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु लीला स्थल दोपहर से ही लीला स्थल पर पहुंच चुके थे। निर्धारित समयानुसार काशी नरेश अनंत नारायण सिंह भी शाम तक लीला स्थल पहुचे और जनता का अभिवादन स्वीकार किया। चारों भाइयों भाइयों का मिलाप होने के बाद काशी नरेश ने भगवान की परिक्रमा की। सोने की गिन्नी देकर प्रसाद ग्रहण किया।

• नाटी इमली भरत-मिलाप की का 476 वर्ष का है इतिहास

दुनियां का सबसे पुराना विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली का भरत मिलाप हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गया। यदुवंशियों के कंधो पर पुष्पक विमान से रघुकुल भूषण श्रीराम,भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अयोध्या के लिए रवाना हुये। चित्रकूट लीला समिति का यह भारत मिलाप लोगों ने अपनी आंखों मे कैद किया। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम स्वयं लीला के लिए पधारते हैं। शाम को लगभग चार बजकर चालीस मिनट पर जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणे भरत मिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ी तो माहौल थम सा गया और दौड़ पड़े राम और लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न से मिलने के लिए, जैसे ही चारो भाई गले लगे तो पूरा लीला स्थल हर हर महादेव के जयघोष से गूँज उठा।धर्म की नगरी काशी में सात वार और तेरह त्यौहार की मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है की यहां पर साल के दिनों से ज्यादा पर्व मनाये जाते हैं। नवरात्र और दशहरा के बाद रावण दहन के ठीक दूसरे दिन यहां पर विश्व प्रसिद्द भरत मिलाप का उत्सव भी काफी धूम धाम से मनाया जाता है। शहर में इस पर्व का आयोजन कई अलग अलग स्थानों पर होता है लेकिन चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा आयोजित ऐतिहासिक भरत मिलाप को देखने के लिए लाखों की भीड़ उपस्थित रही।लगभग पांच सौ वर्ष पहले संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे। मान्यता है की उन्हें स्वप्न में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्हीं के प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की। दशहरे के दूसरे दिन एकादशी को काशी के नाटी इमली के मैदान में भारत मिलाप का आयोजन होता है।मान्यता है की 476 वर्ष पुरानी काशी की इस लीला में भगवान राम स्वयं धरती पर अवतरित होते है। कहा ये भी जाता है की तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के तुलसीघाट पर लिखा उसके बाद तुलसीदास ने भी कलाकारों को इकठ्ठा कर लीला यहा शुरू किया था। मगर उसको परम्परा के रूप में मेघा भगत ने ढाला। कहते हैं कि मेघा भगत को इसी चबूतरे पर भगवान राम ने दर्शन दिया था तभी से काशी में इस स्थान पर भरत मिलाप शुरू हुआ।इस मेले को लक्खी मेला भी कहा जाता है।

• यदुवंशियों के कंधो पर सजे रथ पर सवार होकर अयोध्या पहुंचे श्रीराम

काशी की इस परम्परा में लाखों का हुजूम उमड़ता है भगवान राम, लक्ष्मण माता सीता के दर्शन के लिए शहर ही नहीं अपितु पुरे संसार के लोग उमड़ पड़ते है। वहीं परंपरा का निर्वाह काशी नरेश सदियों से करते चले आ रहे है बिना काशी नरेश के लीला स्थल पर आये लीला शुरू नहीं होती सबसे पहले महाराज बनारस लीला स्थल पर पहुंचते है।एक तरफ भरत और शत्रुघ्न अपने भाईयों के स्वागत के लिए जमीन पर लेट जाते हैं तो दूसरी तरफ राम और लक्ष्मण वनवास ख़त्म करके उनकी और दौड़ पड़ते हैं। चारो भाईयों के मिलन के बाद जय जयकार शुरू हो जाता है। परंपरा के अनुसार फिर चारों भाई रथ पर सवार होते हैं। यदुवंशी समुदाय के लोग उनके रथ को उठाकर चारो और घुमाते हैं।इस लीला को देखने के लिए क्या बच्चा क्या बुजुर्ग सबके मन में केवल एक ही श्रद्धा भगवान का दर्शन।सनातन संस्कृति को नजदीक से देखने के लिये भारत के कोने कोने से तो लोग आते ही वही यादव बंधू वर्षो से कई पीढियों से चली आ रही इस प्राचीन परम्परा का निर्वहन करते आ रहे है। साथ ही में प्रभु राम के परिवार के प्यार को अपने अन्दर आत्मसात करते है।

• काशी नरेश के लीला स्थल पर पहुंचते ही भरत-मिलाप हुआ संपन्न

हर हर महादेव के जयघोष के साथ लोगों ने महाराज बनारस अनंत नारायण सिंह का अभिवादन किया और लीला स्थल से विदाई ली। काशी की यह लीला लोग साल भर अपनी आँखों में संजोकर रखते है। भगवान स्वरुप पात्रों के बीच वे अपने आपको पाकर धन्य महसूस करते हैं। आज के वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में भागदौड़ की जिन्दगी के बीच आस्था के इस प्रवाह को देखने के लिए उमडे लोग इस सच को उजागर करते हैं। ईश्वर आज भी उनके मन में बसे हैं।





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