दबें क्यों गोरों से ?



--के• विक्रम राव,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

गुलाम भारत में जन्मा हूँ। अतः फिरंगी के प्रति जुगुप्सा सहज है। इसके चन्द निजी आधार भी हैं। इतिहास साक्षी है कि इन श्वेतों की पूरी नस्ल ही लुटेरी थी, शोषक रही। भारतीय भाषाओं को अवरुद्ध कर डाला।

स्वतंत्रता सेनानी का आत्मज हूँ। सन 1942 में संपादक-पिता को जेल में कैद किया गया था। नतीजन घर में बमुश्किल कई दिनों तक एक बार ही चूल्हा जल पाता था। दशकों बीत गए मगर याद उस त्रासदी की धुंधली नहीं हुई। इसीलिए जब पढ़ा तो वह उक्ति सच लगी, जो गत सदी के लन्दनवासी उपन्यासकार और समालोचक मैलकम ब्रेडबरी ने लिखा था, कि : “अनैतिकता की कठोरतम संहिता के लिए अंग्रेज विश्वभर में मशहूर हैं।” बस इसीलिए बहुत नीक लगा जब (17 फरवरी 2020) ब्रिटिश सांसद डेब्बी एब्राहम को अवैध प्रवेश पर (बिना वीजा लिए) दिल्ली हवाई अड्डे से बैरंग वापस भेज दिया गया। सार्वभौम गणराज्य कोई मुसाफिरखाना नहीं। नियम कायदे होते हैं।

20 फरवरी को इस्लामाबाद में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के साथ उसी डेब्बी ने भारत पर विष वमन किया। अंग्रेजी भाषायी मीडिया ने मसाला भर कर प्रस्तुति की कि क्यों काश्मीर को पाकिस्तानी जागीर मानने वाली इस ब्रिटिश सांसद को प्रवेश नहीं करने दिया गया था। डेब्बी एब्राहम लन्दन में संसदीय सर्वदलीय कश्मीर समिति की अध्यक्ष हैं। अहर्निश भारत को विस्तारवादी चित्रित करती हैं। मुद्दा बनाती हैं जनमत संग्रह का, जिसका जवाहरलाल नेहरू ने वादा किया था। इससे मुकर जाने के लिए भारत को कठघरे में वे खड़ा करती हैं। पाकिस्तान को पीड़ित मानती हैं। ब्रिटेन ने हमेशा पाकिस्तान का पक्ष लिया। भारत के विभाजन को मिलाकर। जलियाँवाला के लिए पश्चाताप तक व्यक्त नहीं किया। मगर कश्मीर में मानवाधिकार की बड़ी फ़िक्र है।

डेब्बी एब्राहम के अवैध वीजा पर एक निजी वाकया याद आया। तब राष्ट्र्मंडल के नागरिकों के लिए ब्रिटेन में प्रवेश हेतु वीजा नहीं होता था। केवल पासपोर्ट दिखाने पर ही हो जाता था, वीजा-मुक्त एंट्री। आतंकी वारदातों के बाद वीजा लागू हुआ। इन्डियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (आई•एफ•डब्ल्यू•जे•) के अध्यक्ष के नाते उन दिनों मैं ब्रिटिश नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के निमंत्रण पर इंग्लैंड गया था। साथ में परिवार भी था। हीथ्रो हवाई अड्डे पर आव्रजन हेतु हमें लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ी। मैं उन गोरे अफसरों को उन्हीं की मातृभाषा में समझाता रहा कि भारतीय नागरिकों को ब्रिटेन में प्रवेश हेतु वीजा नहीं चाहिए। यह घटना अगस्त 1984 की है।

आव्रजन हाल के उस पार ब्रिटिश एनयूजे के अध्यक्ष जार्ज फिंडले अपने साथी पत्रकारों के साथ मेरी प्रतीक्षा में थे। मेरा धीरज ख़त्म हो रहा था। एक अफसरनुमा अंग्रेज से मैंने कहा कि नियम ठीक से पढ़ो हम भारतीयों को वीजा के नियम से छूट है। पर उसने तमीज नहीं दिखाई। तब मैंने कहा, “मिस्टर तुम्हारे पूर्वज जबरन भारत भूमि कब्जियाये थे और दो सदी तक बिना वीजा के डटे रहे। आज हमसे वीजा माँग रहे हो?” वह गोरा अन्तर्निहित व्यंग्य भांप गया। फिर हमने लन्दन में प्रवेश किया। पहला काम मैंने किया कि इंडिया हाउस जाकर भारत के उच्चायुक्त को जगाया कि ऐसी नामाकूली एअरपोर्ट पर हो रही है। उसे रोकें, ताकि अन्य भारतीयों को सादर आने दिया जाय।

और अब दिल्ली में अवैध वीजा लेकर आयीं ब्रिटिश सांसद सीनाजोरी कर रही हैं!

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