नज़रिया: कुछ चूकें यदि ना होतीं तो.....



--डॉ• विवेक मिश्र,

शुरुआत में कोरोना से लड़ने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने जो कदम उठाए वे सब अपने-अपने दायरे में रहकर, अपने तरीकों से लिए गए निर्णय थे।

उनमें आपसी तालमेल की भारी कमी दिखी। यानी किसी के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं थे। न कोई कोर्डिनेशन प्लान।

इसलिए तमाम कदम उठाते हुए एक जो चूक हुई वो यह कि देश के भीतर ये सब गतिविधियां शुरू हुईं, पर घर के बाहर का दरवाज़ा तो खुला पड़ा रहा। मतलब अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को न तत्काल बंद किया गया, न प्रभावित देशों से आने वाली उड़ानों से आए यात्रियों की ठीक से जांच हुई। न किसी में खाँसी, जुकाम और बुखार के लक्षण पाए जाने पर उन्हें एकांतवास यानी क़वेरिनटाइन में ही भेजा गया।

फरवरी के पहले हफ़्ते दिल्ली चुनाव की ख़बरें देशभर में छाई रहीं। दिल्ली का चुनाव पार्टियां नहीं सरकारें लड़ रही थीं। केंद्र और राज्य में जैसे सब स्थगित था। नेताओं के लिए जीत हार किसी आने वाली महामारी से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

फिर दिल्ली में दंगे भड़क उठे। एक तरफ दंगे हो रहे थे और दूसरी तरफ़ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का जबरदस्त तामझाम के साथ स्वागत किया जा रहा।

उधर ट्रंप विदा हुए। इधर दंगों से निपटने में सरकार ने सख्ती दिखाई, हालात संभले और इस सब में फरवरी जो दरसल इस बीमारी के बारे में अवेयरनेस फैलाने का, सिस्टम और पब्लिक को इस खतरे से लड़ने के लिए तैयार करने का समय था वह निकल गया।

इस बीच न केवल अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने आती रहीं, कोरोना से प्रभावित देशों से भारतीय भी आकर बिना किसी प्रतिबन्ध या परहेज और एहतियात के अपने घर के सदस्यों और आसपास के लोगों से मिलते रहे बल्कि विदेशी पर्यटक भी यहाँ लगातार आते रहे।

मध्यप्रदेश के ओरछा में तो बकायदे 'नमस्ते ओरछा' का अन्तर्राष्ट्रीय महोत्सव आयोजित हुआ। सैकड़ों विदेशी मेहमान आए, रुके और भारत के अन्य शहरों में घूमघाम कर लौट गए।

इस तरह के तमाम घटनाक्रमों ने हमें बताया कि एक देश के रूप में भारत में अपने राज्यों से कोर्डिनेशन लगभग ज़ीरो है।

लगभग 18 मार्च तक कुछ एक अस्पतालों को छोड़कर बाकी सारे हेल्थ सेंटरों में सारे विभाग पहले जैसे चलते रहे।

हम सबकी नींद टूटी जब योरोप में हालात बेकाबू होने लगे। वहाँ हज़ारों मौतें होने लगीं। और सही मायने में जब वहाँ लॉक डाउन शुरू हुआ और वहाँ से भारतीय लोगों को वापस भेजा जाने लगा, या उन्होंने ख़ुद अपने वतन का रुख किया। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दिल्ली के साथ कई राज्यों में जरूरी सेवाओं को छोड़कर बाकी सारी सेवाएं बंद कर दी गईं। परीक्षाएं कैंसिल हुईं। पर जो एक बात रह गई वो थी इतने बड़े देश में अलग अलग लेवल पर एवेयरनेस फैलाने और सुस्त व्यवस्था को टाइट करने का, देश व्यापी लॉक डाउन जैसे कदम के लिए तैयारी का समय नहीं बचा।

जैसे जनता अपनी सरकार और स्वास्थ सेवाओं की तैयारी जानती थी वैसे सरकारें भी देश की जनता और उसके भीतर के सोशल इनर्सिया को जानती थी पर दोनों के बीच कोई संवाद न हुआ।

इतने बड़े देश में एक 10 मिनट के भाषण से सबको सही दिशा निर्देश मिल जाने और सबके उनको पालन करने लगने की कल्पना करने लगना, एक सपने जैसा है।

इसका उदाहरण हमने प्रधानमंत्री की जनता कर्फ्यू के बाद 5 बजे हेल्थ केयर वर्कर्स को धन्यवाद कहने के लिए ताली बजाने के आह्वान के लिए सड़कों पर उतर आई अराजक भीड़ के रूप में देख ही लिया।

उसके एक दिन बाद 25 मार्च को सम्पूर्ण देश में लॉक डाउन जरूरी सेवाओं को छोड़कर हर जगह ताला बंदी हुई। यह सबसे कारगर कदम माना जा रहा था, और उपचार के अभाव में शायद था भी पर यह भी मजदूरों और अनियमित कामगारों के लिए निवारण की जगह किसी विपत्ति की तरह आया।

दिल्ली सरकार ने इनके लिए कई घोषणाएं कीं, केंद्र ने भी एक पैकेज की घोषणा की पर घोषणा होने और आमजन का भरोसा जीतने के बीच की खाई बढ़ती गई। खाली जेब और खाली पेट लोग रेल और बस बंद होने के बाद भी पैदल ही शहर से अपने गाँवों की ओर चल पड़े।

मीडिया इनकी तस्वीरें दिखाता रहा, नियमित आय वाले लोग घर में बैठकर उन्हें देखकर दुख जताते रहे पर उन्हें रोककर उनका दुख दूर करने वाला कोई नहीं था। इक्का दुक्का व्यक्तिगत प्रयासों की खबरें आती रहीं। पर सब जानते थे ये नाकाफ़ी हैं। इनमें से कितने घर पहुँचे, कितने रास्ते में है और कितनों को गाँव पहुँचकर बीमारी के डर से अपने ही गाँव और घर मे घुसने नहीं दिया गया इसका कोई ठीक ठीक आंकड़ा कहीं नहीं है।

इस दौर से गुज़रते हुए लगता है आज़ादी के बाद से अब तक जाति, धर्म, भाषा से लेकर तमाम बातों के लिए आंदोलन हुए, अभियान चलाए गए पर राष्ट्र के एकजुट होकर किसी आपदा से निपटने का कोई अभियान निरंतरता से नहीं चलाया गया। हमारी सारी चिंता और तैयारी अपने लिए थी एक राष्ट्र की तरह हमारी कोई तैयारी नहीं थी। हमारी प्रतिबद्धताएं हमारे धर्म, हमारी राजनैतिक पार्टियों, हमारे नेताओं के लिए तो थीं पर देश और उसके नागरिकों के लिए नहीं।
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(लेखक पेशे से दन्तचिकित्सक और प्रसिद्ध हिन्दी कहानीकार हैं। फ़ेसबुक से साभार उनका अपना यह नज़रिया)

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